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यात्रा का मज़ा और पर्यावरण का हाल

जयसिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार
सन 1968 में जब पहली बार बद्रीनाथ बस पहुंची थी तो वहां तब तक लगभग 60 हज़ार यात्री पहुंचते थे. बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के रिकॉर्ड के अनुसार गत वर्ष 9 लाख 71 हज़ार तीर्थ यात्री बद्रीनाथ के दर्शनों के लिए आए थे. समुद्र तल से लगभग 15,210 फुट की ऊंचाई पर स्थित हेमकुंड लोकपाल में 1936 में एक छोटे से गुरुद्वारे की स्थापना की गई.
1977 में वहां केवल 26700 सिख यात्री गए थे. लेकिन 2009 में हेमकुंड जाने वाले यात्रियों की संख्या लगभग 5 लाख तक पहुंच गई. इसी तरह 1969 में जब गंगोत्री तक मोटर रोड बनी और 1987 में वहां भैरों घाटी का पुल बना तो वहां तब तक लगभग 70 हज़ार यात्री पहुंचते थे.
लेकिन पिछले साल तक गंगोत्री पहुंचने वाले यात्रियों की संख्या 3 लाख 75 हज़ार से ऊपर चली गई. हालांकि यमनोत्री के लिए अब भी क़रीब 14 किलोमीटर की पैदल यात्रा है फिर भी वहां पहुंचने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या भी 3 लाख 50 हज़ार तक पहुंच गई है.
समुद्रतल से 6714 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैलाश मानसरोवर में भी अब हर साल 500 यात्री पहुंचने लगे हैं. कुल मिलाकर देखा जाए तो पर्यावरणीय दृष्टि से अति संवेदनशील उत्तराखंड हिमालय के इन तीर्थो में हर साल करीब 20 लाख लोग पहुंच रहे हैं. तीर्थ स्थल ही क्यों, मसूरी शिमला और नैनीताल जैसे पर्यटक नगरों में भीड़ बढ़ने से पारितंत्र प्रभावित हो रहा है.
नैनीताल में 1958 में एक लाख 60 हज़ार पर्यटक पहुंचे थे जिनकी संख्या 1986 तक 7 लाख सालाना तक पहुंच गई थी. यही हाल मसूरी का भी है. बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमनोत्री के लिए कभी पैदल यात्रा थी और उनके पड़ावों पर छोटी छोटी चट्टियां हुआ करती थीं. आज वे चट्टियां विशाल नगरों का रूप ले चुकी हैं.
Comments
Dear Shiv ji and Shalini ji,
This is great effort , we congratulate you for this.
We can find all the relevent and important column in Hill waani.This will definitely a great platform to share and provide a space for rural journalism in the main stream of Journalism and we were alwyas remain neglected in the Main Stream line journalism.
But no i am confident that you will be able to raise the voices of unheard,marginalised and neglected mass media of remote Himalyas.
We wish you all success.
Regards.
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