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मुख्य मुद्दा
कॉर्बेट पार्क के विस्थापितों का आक्रोश भड़का


चंदन बंगारी

विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के भीतर पड़ने वाले गांवो से विस्थापित किए गए ग्रामीण अपने हक़ को लेकर अब आरपार की लड़ाई लड़ने का मन बना रहे हैं. विस्थापन के समय किए गए वायदे के अनुरूप ज़मीन न मिलने से उनमें आक्रोश पनप रहा है.

आलम ये है कि 17 साल बाद भी ग्रामीणों की ज़मीन की पैमाइश नहीं की जा सकी है. जिसके कारण उन्हें स्थाई और जाति प्रमाणपत्रों से भी वंचित होना पड़ रहा है. वे राजस्व गांव की मांग कर रहे हैं. ये हालात तब है जब पार्क से सटे अन्य गांवों को भी विस्थापित करने की तैयारी की जा रही है.

जिम कॉर्बेट पार्क के विस्तार को देखते हुए पार्क प्रशासन ने 1994 में पार्क के भीतर बफ़र ज़ोन में बसे राजस्व गांव झिरना, कोठिरों और धारा गांवों को विस्थापित करके हिम्मतपुर ब्लॉक के पास नई बस्ती-16 में बसाया था. इसके अलावा अन्य परिवारों को कई दूसरी जगह बसाया गया. विस्थापन के समय सरकार ने ग्रामीणों को गांव के बराबर ज़मीन दूसरी जगह देने की बात कही थी.

लेकिन विस्थापन के 17 साल बीतने के बावजूद अभी तक उन्हें हक हकूक नहीं मिल सकता है. ग्रामीणों को अभी तक सही पैमाइश की ज़मीन नहीं मिल पाई है. जितनी ज़मीन मिली भी है वो उनके नाम पर नहीं है. इस भूमि का मालिकाना हक़ अभी भी वन विभाग का ही है. ज़मीन ग्रामीणों के नाम न होने से उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है.

ज़मीन नाम पर न होने के कारण ग्रामीणों को कोई नया व्यवसाय शुरू करने के लिए बैंकों ने भी उन्हें ऋण देने से मना कर दिया है. ग्रामीणों को जंगल से दूर करके बस्ती के बजाय जंगल किनारे बसा दिया गया है. जहां न तो पीने के पानी की सुविधा है न ज़मीन को सींचने के लिए नहर का पानी. बरसात के समय गांव पानी से सराबोर हो जाता है. जंगल के किनारे रहने पर वन्य जीव अलग से परेशान करते हैं.

ये हालात तब है जब पार्क प्रशासन अन्य गांवों की भी विस्थापन की योजना बना रहा है. सरकार की विस्थापन की सही नीति न होने के कारण झिरना ज़ोन में बसा लालढांग गांव आज तक पूरी तरह विस्थापित नहीं हो सकता है. गांव में अभी भी बसे 22 परिवार गांव छोड़ने को तैयार नहीं है. हालांकि गांव के 110 हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण किया जा चुका है. वहीं पार्क की सीमा से सटे पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र के ग्राम तैड़िया व पांडे के 116 परिवार जंगली जानवरों के आतंक से दुखी होकर पुनर्वास की मांग कर रहे हैं. अभी पार्क में बसे 242 गुर्जर परिवारों के पुनर्वास की योजना प्रस्तावित है.

अगर ज़मीन की पैमाइश और राजस्व गांव घोषित करने की मांग सही सयम पर पूरी न हुई तो ग्रामीणों का गुस्सा फूट सकता है. ये गुस्सा कहीं पार्क प्रशासन के अन्य गांवों के विस्थापन की योजना में रोड़ा न बन जाए. जिसके चलते आंदोलन उग्र रूप धारण करने के साथ ही सरकार और प्रशासन के लिए गले की हड्डी न बन जाए. इस मामले पर कॉर्बेट पार्क के निदेशक रंजन मिश्रा का कहना है कि उन्होंने राजस्व भूमि के बदले ग्रामीणों को वन भूमि दे दी है. अब ग्रामीणों को सुविधाएं नहीं मिल रही हैं तो ये डीएम स्तर का मामला है.

एसडीएम अनूप कुमार नौटियाल का कहना है कि राजस्व गांव घोषित करने के प्रस्ताव बनाने को लेकर ज़मीनी परेशानियां आ रही थीं. जिसे दूर कर लिया गया है. अब इसे राजस्व गांव घोषित करने का प्रस्ताव शासन को भेजा जा रहा है. जहां तक ग्रामीणों को भूमि कम मिलने की शिकायत का सवाल है तो इस पर प्रशासन का टका सा जवाब है कि शिकायत मिलेगी तो निस्तारण कर देंगे.

- रामनगर से चंदन बंगारी.



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