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उत्तराखंड में महिलाएं और बच्चे कुपोषण का शिकार
उत्तराखंड में कुपोषण के हालात पर केंद्र की चिंता के बाद राज्य सरकार हरकत में आ गई है. कितने बच्चे राज्य में कुपोषण के शिकार हैं इसका ताज़ा आंकड़ा सरकार के पास नहीं है. इसीलिए 14 नवंबर से एक सर्वे अभियान शुरू किया गया है.
सरकार ने माना है कि हालात चिंताजनक हैं. तीसरे नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट में बताया गया है कि तीन वर्ष व इससे कम आयु के 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ था कि कुपोषण कम करने के मामले में राज्य के पास अपनी कोई कार्ययोजना नहीं हैं.
2005-06 के तीसरे नेशनल फैमिली सैंपल सर्वे के मुताबिक उत्तराखंड में
1. पांच साल से कम उम्र के 44 फीसदी बच्चे कमज़ोर कदकाठी के. इसका मतलब उन्हें पूरा पोषण नहीं मिल पाया.
2. हर पांच में से एक बच्चा, बहुत पतला है जो बीमारी या कम भोजन से ऐसा हुआ हो.
3. 38 फीसदी बच्चे कम वजन वाले जो लंबे समय से अपर्याप्त पोषण का नतीजा
4. बच्चों का न्यूट्रीश्नल स्टेटस एनएफएचएस-2 के मुकाबले सुधरा है.
5. लेकिन अंडर न्यूट्रीशन अभी भी एक बड़ी समस्या है.
6. ग्रामीण इलाकों में समस्या ज़्यादा, गरीब तबकों में ज़्यादा,
7. वयस्कों में भी 30 फीसदी महिलाएं और 28 फीसदी पुरुष कुपोषण के शिकार
8. 55 फीसदी महिलाएं एनीमिया की शिकार
इन आंकड़ों की रोशनी में अब उत्तराखंड सरकार देर से ही सही हरकत में आई है. उसका कहना है कि ताज़ा आंकड़े नहीं आए लेकिन उसने माना है कि हालात अच्छे नहीं है. इसीलिए एक सर्वे शुरू करा दिया गया है. केंद्र ने हाल में उत्तराखंड से कुपोषण को लेकर जवाब भी तलब किया था. उसका कहना था कि राज्य में न्यूट्रीशन कौंसिल भी नहीं बनी है. इस पर राज्य सरकार का कहना है कि इस पर काम शुरू हो गया है.
नैनीताल में जून 2010 में केंद्रीय महिला और बाल विकास राज्य मंत्री कृष्णा तीरथ ने संसद की सलाहकार समिति की एक बैठक बुलाई थी. जिसका विषय था महिलाओं और बच्चों में कुपोषणः समस्या और निदान. तीरथ ने भारत में कुपोषण की समस्या और इससे अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को रेखांकित किया था. राज्य सरकार का कहना है कि उसने महिलाओं और बच्चों के लिए राज्य ने कई योजनाएं शुरू की हैं. जिसके लिए दो करोड़ रुपए से भी अधिक का बजट भी रखा गया है.
कुपोषण के मामलों को देखें तो इसकी प्रमुख वजहों में हैं गरीबी, गंदगी, एनीमिया, पौष्टिक भोजन की कमी, जागरुकता की कमी है. इसी वजह से शिशु मृत्यु दर भी राज्य में प्रति हज़ार पर 44 है., और मातृ मृत्यु दर एक लाख पर 315 की है.
-हिलवाणी डेस्क
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