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एक पहाड़ी क़स्बे की याद

नैनीताल के पास भवाली की यात्रा का वृतांत पेश कर रहे हैं चंद्रशेखर तिवारी
उत्तराखण्ड के पहाडी़ इलाके में एक छोटा सा सुन्दर कस्बा है भवाली। कुमाऊं के प्रवेष द्वार हल्द्वानी से अल्मोड़ा को जाने वाली घुमावदार मोटर सड़क इसी कस्बे से होते हुए जाती है। भवाली से रामगढ़ और भीमताल को भी सड़कें जाती है।
पर्यटन और नगरीकरण के बढ़ते दबाब से भले ही इस कस्बे ने वर्तमान में बेहद बदनुमा शक्ल अख्तियार कर ली हो अथवा कस्बे से होकर बहने वाली उत्तरवाहिनी नदी ने अब गन्दे नाले का रुप ले लिया हो पर फिर भी मुझे यह कस्बा अभी तक कुछ खास जैसा ही लगता है । कहा जाता है सन 1895-1897 में तारपीन फैक्ट्री व 1912 के आसपास सेनिटोरियम खुलने से इस कस्बे का विकास हुआ। उससे पहले यहां चाय व फलों का बगीचा था। अंग्रेजो ने इस कस्बे को पलटन का पड़ाव भी बनाया। यह कस्बा महान सन्त नीम करौली बाबा व नान्तिन महराज की प्रिय स्थली भी रहा।पहाड़ी फलों की मण्डी के नाम से प्रसिद्व इस कस्बे में बारों महीने फलों की बहार रहती है। पेटियों में सजे रंग बिरंगे फल सभी को आकर्षित करते हैं।
मेरे जेहन में इस कस्बे की चार दशक पुरानी तस्वीर आज भी ज्यों की त्यों अटकी पड़ी है जो मेरे बचपन के दिनों में हुआ करती थी। इस कस्बे के प्रति अभी तक जो मेरा मोह बरकरार है उसका कारण क्या है वह मैं ठीक से अभी तक नहीं जान पाया, पर बहुत हद तक इसकी वजह शायद यही हो सकती है कि इस सुंदर व शांत पहाड़ी कस्बे में मेरी मंझली बुआ रहा करती थीं। बुआ के घर पिताजी के साथ मैं जब-तब आता रहता था।मेरे पिता जी तब रामगढ़ से काफी आगे ओखलकांडा में जंगलात महकमें में मुहर्रिर थे। मां तब बड़ी दीदी और दो छोटी बहिनों के साथ गांव में ही रहती थीं।
मेरी अच्छी पढ़ाई हो इस वजह से मुझे गांव में नहीं रखा गया। नवरात्र, दीपावली ,होली अथवा अन्य मौकों पर मैं पिता के साथ जब गांव जाता तो बुआ का यह घर तब मात्र एक ही रात का पडा़व होता था। गरमियों में स्कूल की लम्बी छुट्टियां हो जाने पर बुआ मुझे यहां बुला लेती। तब गरमियों में यह कस्बा मुझे ज्यादा ही अच्छा लगने लगता क्योंकि तब यह कस्बा मेरे लिये अधिक दिनों का पडा़व बन जाता था।
मुझे लगने लगता कि मैं इसी कस्बे का रहने वाला हूं और कस्बे के खेल-तमाशे,यहां के लोग,मिट्टी-पत्थर, गली-सड़क व दुकानों की हर धड़कन मुझ में समा सी गयी है। बुआ का सबसे छोटा लड़का सुधीर उम्र व पढा़ई के दर्जे में मेरे बराबर का था सो हरदम उसके साथ खेलने-कूदने व घूमने-फिरने से इस कस्बे के चप्पे चप्पे ने अल्प समय में ही मुझसे जान-पहचान बना ली थी। मेरी बुआ यहां बीच की बजार में एक दुमंजिले किराये के मकान में रहा करती थीं। बुआ का भरा पूरा परिवार था। चार लड़कियां व पांच लड़के थे। बुआ के पति यानि मेरे फूफा जी आयुर्वेद व कर्मकाण्ड के अच्छे ज्ञाता थे। आसपास के इलाके व इस कस्बे में वे “वैद्यज्यू“ के नाम से ख्याति प्राप्त थे। मल्ली बाजार में उनकी दवाखाने की एक छोटी सी दुकान थी।
दुकान की अल्मारियों में सजाकर रखी हुई आसव,भस्म,रस,आरिष्ट, अवलेह व चूर्ण की शीषियां मुझे आकर्षक लगती खासकर अनारदाने के चूरन वाली गोलियां।बाय-बात,गठिया, श्वास व प्रसूति से ग्रस्त अधिसंख्य मरीज उनके पास दवा लेने आते। उनकी दवा का मरीजों पर असर भी अच्छा होता। गरीब मरीजों को वे कम दामों अथवा बगैर पैसे लिये भी दवा दे देते।
जड़ी बूटियां पंसारी की दुकान से खरीदकर सारी दवाएं घर पर ही बनायी जातीं जिनकी सुगन्ध से घर महका रहता। बुआ के घर के निचली मंजिल पर डूंगरदा की चाय-पकौड़े की दुकान थी। इस दुकान में पहाड़ी मसालों से तैयार राजमा और चने के जायकेदार छोले कुछ खास ही होते। पीतल के चमचमाते गिलासों में चाय की चुस्कियों का स्वाद ही अलग आता। डंूगरदा की दुकान की बगल में मन्दिर के पुजारी जी का परिवार रहता था। जब-तब संस्कृत के मधुर श्लोकों की गूंज कानों में पड़ती रहती. पुजारी जी के बगल में सुनार की दुकान थी।
बैजलाल वर्मा की यह दुकान गलोबन्द, कानों के झुमके व पहाडी़ नथों के लिये प्रसिद्व थी। इस कस्बे के कुछ खास व्यक्तियों का खाका अभी तक मेरे मन से हटा नहीं है। उनका जिक्र मैं जरुर करना चाहूंगा। क्यों न सबसे पहले श्यामा की ही बात कर ली जाय। श्यामा इस कस्बे में नोटिफाइड एरिया में एक सफाई कर्मचारी था जो कस्बे में मुनादी पीटकर सूचना देने का काम भी करता था। क्या गरजती हुई आवाज थी उसकी। उसकी खाकी वर्दी ,सिर पर नीली टोपी और चमकदार लम्बी मूंछों की याद मुझे अब तक है।
पोपले मुंह वाली उस बूढ़ी ईसाई महिला का चित्र भी याद आ रहा है जो बस स्टैण्ड और बाजार में घूम घूम कर लोगों से पैसे मांगती फिरती थी उसका एक ही डायलॉग होता ‘‘ बाबूजी दस पईसा दै दो।‘‘ बालम,केषर,रेखा ,रोहित ,मोहित,तुलसी जैसे कुछ नाम भी याद आ रहे हैं, जिनके साथ गुड्डे-गुडि़या के खेल से लेकर छुपम-छुपाई का खेल होता।
रामलीला में दशरथ का शानदार अभिनय करने वाले भगत जी की लम्बी दाढी, सोडा वाटर की की बोतलें बेचने वाला मोटी तोंद वाला शेखर,मांगल गीतों में मिठास घोलने वाली शैला की ईजा, शादी व्याह में बजने वाले तिरछाखेत बैण्ड की मधुर आवाज के साथ ही सुबह सवेरे काष्तकारों से फल व शाक सब्जियों की खरीद की बोली लगाते आढ़तियों का चेहरा बार-बार आखों के सामने घूमता है। शाम के वक्त चौराहे पर गोपाल की आलू की टिक्की व तसले मे भूनी मंूगफलियों की खुश्बू हमारे अन्दर तक धर कर जाती।
कस्बे की आनन्द मिष्ठान वाले की लौज, कुंवर हलवाई की जलेबी व भवानीदत्त के मलाई के लड्डू व पे्रंम बिस्कुट वाले की नानखटाई के स्वाद का भला कहना ही क्या। रामगढ़ व भीमताल के दोराहे के समीप बना लल्ली कब्र की अप्रतिम वास्तुकला हमें सहज ही अपनी ओर खींचती। जब भी पैदल घोड़ाखाल व सातताल घूमने जाते उसकी याद कई दिनों तक मन में बसी रहती।
इस कस्बे में रहने वाली मेरी बुआ अब जिंदा नहीं है। बुआ के परिवार वाले भी अब हल्द्वानी और दिल्ली बस चुके हैं,पर बुआ का वह घर आज भी मामूली बदलाव के साथ उसी जगह बदस्तूर खड़ा है। बस से अपने घर अल्मोड़ा आते-जाते अब भी मेरी निगाह उस घर पर जरुर पड़ती है और मैं अपने बच्चों से कहता हूं ‘‘यही था मेरी बुआ का घर‘‘ वह घर जिसके मार्फत ही बचपन में इस कस्बे से मेरी दोस्ती हुई।
चद्रंशेखर तिवारी रिसर्च एसोसियेट दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21, परेड ग्राउण्ड , देहरादून
मोबा0 - 9410919938
Comments
apka lekh padkar bhut accha laga. bachpan ki yaden tarotaja kar di. village ke gali mohle ki yaden sabhi ko acchi lagti he. thank you sir,
Khushi Ram Sharma
Village Kota Kuwanu
Thesil Chakrata
Dehradun
rochak aur mazedar lekhan. padhkar laga ki bhanwali ki sher kar li.
Chandrakher ke saath jab bhi Bhowali se gujarta tha vo iske bare me baaten kiya karte the. Yeh lekh parhkar mahsoos hua ki unka Bhowali se kitna lagav hai, emotional. I liked this article
Chandrakher ke saath jab Bhowali se jata tha. Yeh lekh parhkar mahsoos hua ki unhone apne beete dinoo ki yadon ko taja kiya tatha unka aj bhee Bhowali se bahut lagav hai.
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Tiwari ji,namaskar. Apka lekh padh kar bahut aacha laga mujhe. jo boodi aurat paise mangti thi, wo blossom aunty thi, jo ki ab iss duniya mai nhi rhi. Aur shayad apne apne iss lekh mai mere chote bhai mohit aur mera jikr kiya hai. Kya wo hum hi dono hai..? Kripa krke mjhe apna reply diijiyaega..jaruur.:-) Dhanyawaad aapka..
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