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क्रिकेट में कविता के रचियता द्रविड़
राहुल द्रविड़ ने आख़िरकार क्रिकेट से संन्यास ले लिया. विश्व क्रिकेट में द्रविड़ अपनी शास्त्रीयता के लिए जाने जाते हैं. उनकी बैटिंग इतनी अलग विशिष्ट और क्लासिक है कि उसे किसी एक उदाहरण में फ़िट करना मुश्किल है. उनका क्रिकेट रचना का वो बिंदु है जहां तमाम कलाएं थिरकती रहती हैं. भौतिकी कविता संगीत सबकुछ..
युवा पत्रकार और खेल जानकार अनवर जे अशरफ़ का राहुल द्रविड़ पर ये आलेख जर्मन रेडियो डॉयचे वेले की हिंदी सेवा की वेबसाइट से साभार.
सोलह साल में दीवारें कमजोर हो जाया करती हैं. कई जगहों से दरक जाती हैं और सुरक्षा के लिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. लेकिन चीन और राहुल द्रविड़ नाम की दीवारें ऐसी नहीं हैं. टेस्ट क्रिकेट देखने समझने वाली पूरी पीढ़ी को द्रविड़ का मतलब पता है. द्रविड़ का मतलब क्रिकेट का मुकम्मल स्तंभ है. वह बल्लेबाज, जो हरी भरी पिचों पर भी जमना जानता है और जो उछाल भरी पिचों पर भी रुक जाना जानता है.
वह क्रिकेटर, जिसके कलात्मक बल्ले का हुनर देखना बहुत सुकून देता है. लेकिन उसकी बदकिस्मती यह कि उसका करियर बरगदनुमा सचिन तेंदुलकर की छाया में बीता और उसे कभी वह जगह नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी. सचिन के बाद... राहुल द्रविड़ की चर्चा कुछ ऐसे ही होती है. लेकिन पता नहीं कितने कोने हैं, जहां वह सचिन से पहले आता है. कभी होठों को अंदर की तरफ भींच कर चुपचाप कवर में चौका लगा देता है, तो कभी पसीने से तरबतर अकेले दम पर घंटों क्रीज पर खड़ा रह जाता है. कभी ढहती पारी को दीवार की तरह सहारा दे जाता है.
लॉर्ड्स से एडिलेड तक के सफर में राहुल के पैर क्रिकेट में कभी गलत जगह नहीं पड़े. इंग्लैंड में जब टीम इंडिया फेल होती रही, राहुल चुपचाप शतक बनाते रहे. ऑस्ट्रेलिया में जब टीम ढहती रही, राहुल अपने बल्ले से बोलते रहे. अपनी जिंदगी और क्रिकेट दोनों को बेहद संजीदा तरीके से जीने वाले राहुल ने अलविदा कहने में भी कोई तमाशा नहीं किया. क्रिकेट मैचों से अलग एक दिन चुना. एक दिन पहले संकेत दे दिया और फिर तैयार किया हुआ टेक्स्ट पढ़ा. सुनने में भले ही यह सब बहुत सुनियोजित और बोरिंग लगे लेकिन क्रिकेट को समझने वाला एक भी शख्स नहीं होगा, जो आज थोड़ा सा जज्बाती न हो रहा हो. एक सुलझे हुए असाधारण बल्लेबाज का ग्राउंड से बाहर जाना दुख तो देता है.
सचिन भले क्रिकेट के भगवान हों, जिन्हें देख कर बल्ला थामा जाता है लेकिन उनके पास नहीं पहुंचा जा सकता. राहुल यह मौका देते हैं. अनगिनत अद्भुत पारियों वाले राहुल बैकग्राउंड में चलते रहते हैं. चाहे कोलकाता में वीवीएस लक्ष्मण को ऐतिहासिक पारी में साथ देने का मामला हो या लीड्स में भरभरा रही पारी को संभाल देने की बात हो. सचिन के आउट होने के बाद अलबत्ता टीवी बंद कर दिया जाता हो लेकिन कई बार जब टीवी दोबारा खुलता, तो वन डाउन राहुल वहीं खड़ा दिखता. द्रविड़ ने कभी कहा था कि उन्हें क्रिकेट में दो चीजें पसंद नहीं आईं, पारी की शुरुआत और विकेट के पीछे खड़े होना. लेकिन टीम ने उनसे कई बार दोनों ही काम कराया. एक बार तो उन्हें वर्ल्ड कप में भी विकेटकीपिंग करनी पड़ी.
परफेक्शनिस्ट द्रविड़ खुद अपनी कीपिंग से खुश न हों लेकिन उनके दस्ताने कई कीपरों से ज्यादा महफूज थे. उनके नाम टेस्ट क्रिकेट में सबसे ज्यादा कैच लेने का रिकॉर्ड भी है. राहुल द्रविड़ इस बात से खुश हो सकते हैं कि उन्होंने भारत के लिए क्रिकेट ऐसे वक्त में खेला जब टीम में सौरव गांगुली, वीरेंद्र सहवाग, सचिन तेंदुलकर, अनिल कुंबले और धोनी जैसे खिलाड़ी थे. लेकिन इन्हीं खिलाड़ियों के चमत्कार ने कई बार राहुल के खेल को फीका कर दिया. सौरव गांगुली के साथ साथ टीम में कदम रखने वाले राहुल को कप्तानी बहुत बाद में मिली. यहां भी किस्मत ऐसी कि ग्रेग चैपल उन दिनों टीम के कोच हुआ करते थे, जिन्होंने पूरी भारतीय टीम का भट्ठा बिठा दिया था. राहुल की कप्तानी में खेला गया 2007 का वर्ल्ड कप याद रखने से ज्यादा भूलने वाला टूर्नामेंट रहा.
लेकिन राहुल कभी न भूल सकने वाले क्रिकेटर हैं. खास कर उस गरिमा की वजह से, जो क्रिकेट को भद्रजनों का खेल बनाता है. जाते जाते भी उन्होंने इस गरिमा का परिचय दिया है और अगली पीढ़ी के लिए जगह खाली कर दी है. उन्होंने क्रिकेट को जो कुछ दिया, क्रिकेट उससे ज्यादा की मांग नहीं कर सकता. यह बात अलग है कि उन्हें उतना दिया नहीं जा सका, जितना उनका हक बनता है.
( होमपेज पर बॉक्स में तस्वीर http://www.nilacharal.com से साभार)
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