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रंग मंडप
एक वो भी रामलीला होती थी

ढहती हुई संस्कृति की एक झलक: कुमाऊं की रामलीला संस्कृति

गोविंद सिंह

कुमाऊं की रामलीलाबहुत चर्चित रही है. देश को अनेक रंगकर्मी इस रामलीला ने दिए. बी एल शाह, बी एम्शाह, मोहन उप्रेती जैसे कलाकारों ने रामलीला की तालीमों में अपनी आरंभिक दीक्षा लीथी. दिल्ली में थे तो बार-बार रामलीला की याद आती थी. चंडीगढ़, मुंबई और दिल्ली मेंभी कुमाऊं और गढ़वाल की रामलीलाएं देखीं लेकिन वह मज़ा नहीं आता था. हल्द्वानी आया तो मन में बड़ी उमंग थी इन रामलीलाओं को देखने की. यहाँ बहुत सी जगहों पर रामलीलाओंके बैनर दिखे.

हल्द्वानी को एक असांस्कृतिक शहर मना जाता है. लेकिन लगभग हरमोहल्ले में सामुदायिक रामलीला मंच बने हुए हैं. जहां नवरातों में रामलीलाएं होतीहैं. यानी ऊपर से असांस्कृतिक लगने वाले इस शहर के भीतर भी जन संस्कृति की एकअजस्र धारा बह रही है. लेकिन उन दिनों कुछ ऐसी व्यस्तताएं रहीं कि नवरातों मेंरामलीला नहीं देख पाया. मन में कसक बनी रही. लेकिन पिछले दिनों चैतीनवरात्रों से पहले अपने इलाके की एक दूकान पर जब रामलीला का एक नोटिस देखा तो बहुतखुशी हुई. आप कहेंगे कि इस मौसम में रामलीला ! लेकिन कुमाऊं में चैती नवरातों मेंभी रामलीलाएं होती हैं. मेरे गाँव में भी इसी मौसम में लीला होती थी.

दूर-दूर के गावों से पैदल चल कर लीला देखने आने वाले दर्शकों के लिए भी यह मौसम सुविधाजनकहोता है. हम लोग पांच किलोमीटर पहाड़ी चढाई चल कर रामलीला देखने निकलते थे. आठ बजेलीला शुरू होती थी और ग्यारह बजे तक खत्म हो जाती थी. हम लोग हाथ में मशालें लिएहुए रात एक-दो बजे तक घर पहुँच पाते थे. मन में चाह होते हुए भी मैं कोई पार्टनहीं खेल पाता था, क्योंकि हमारा गाँव काफी दूर था. लेकिन मेरी क्लास का राजू सीताबना था. और एक क्लास सीनिअर कुंदन ने राम का पार्ट खेला था. हमारे हेड मास्साब ने दशरथऔर राम सिंह सेक्रेट्री ने रावन का. ये छवियाँ कभी नहीं मिटतीं. पंचवटी में शूर्पणखा के आने की तैयारी इसलिए इस बार चैतीनवरात्र में ब्लाक इलाके में रामलीला का मैं दिल से इन्तज़ार कर रहा था.

दिल्ली सेअपनी पत्नी को भी रामलीला देखने को बुलाया लिया था. एक दिन हम लोग निर्धारित समयसे काफी पहले रामलीला स्थल पर पहुँच गए. शुरू में हमें लगा कि शायद लोग नहींआयेंगे लेकिन धीरे-धीरे भीड़ जुटने लगी. जिस हल्द्वानी में लोग नौ बजे तक सोने लगतेहैं, उसी शहर के एक कोने में लोग दस बजे लीला देखने चले आ रहे थे. अनुशासित होकरअपने स्थान पर बैठ रहे थे. पंडाल काफी अच्छा था. मंच में भी कोई कमी नहीं थी. लोगस्वेच्छा से पंडाल के एक कोने में बैठे आयोजकों के पास जाकर चन्दा देने लगे. मैंनेदेखा कि देखते ही देखते दानदाताओं की लाइन लग गयी. मेरी पत्नी भी सौ रुपये दे आयी.कोई पचास दे रहा है, कोई सौ और कोई दो सौ. यानी ये ऐसे लोग थे जो मुफ्त में लीलानहीं देखना चाहते. आयोजकों की हर तरह से मदद करना चाहते हैं.

हम लोग दिल्ली में इसफिराक में रहते थे कि किसी तरह मुफ्त का पास मिल जाए और हम नाटक देख आयें. लेकिनये ऐसे प्रेक्षक हैं, जो पैसे देकर नाटक देखना चाहते हैं. जबकि इनकी माली हालत कोईबहुत अच्छी नहीं है. अब असली बात पर आतेहैं. जिस लीला का हम घंटे भर से इंतज़ार कर रहे थे, वह शुरू हुई. पहले ‘श्री रामचंद्र कृपालु भगवन’ हुआ. फिर कोई और मंगलाचरण. और फिर लीला. लेकिन जल्दी ही मालूमहुआ कि आयोजकों में दर्शकों के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं है. दो मिनट का सीन, और फिरपटाक्षेप. फिर पीछे से कड़-कड़ कड़-कड़. कोई सूत्रधार नहीं. कोई अनाउंसर नहीं. बीच मेंकोई हास्य का सीन भी नहीं. विभिन्न दृश्यों के बीच कोई तालमेल नहीं.

इससे लाख गुना अच्छी रामलीला ४० साल पहले मेरे गाँव में होती थी. कोई साधन नहीं थे, बिजली नहींथी, लालटेन जला कर मंच पर उजाला किया जाता था. किरदार अपना पार्ट याद करके रखतेथे. हर दृश्य की अपनी धुन होती थी. हर चीज एकदम व्यवस्थित होती थी. उद्घोषक सज्जनकी वाचन शैली को तो मैं कभी नहीं भुला सकता. घंटा भर ‘लीला’देखने के बाद लगा कि इसका हाल भी दिल्ली की नौसिखिया रामलीला जैसा ही है. लेकिन यहाँतो इसका इतना समृद्ध समाज है! फिर ऐसा क्यों? लगा कि हमारी संस्कृति को जैसे घुनलग गया है. लोग तो ऐसे आयोजनों में जाना चाहते हैं, लेकिन आयोजन करने वाले ही जैसेसब कुछ भूल गए हैं. रामलीला का आयोजन ही नहीं भूले, अपना कर्त्तव्य भी भूल बैठे हैं.

यह भी लगा कि लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिये धनोपार्जन तो करना चाहतेहैं, लेकिन बदले में देना कुछ नहीं चाहते. हम इस रामलीला के आयोजकों को कोसना नहीं चाहते पर इतने सारे दर्शकों का सम्मान तो उन्हें करना ही चाहिए. आपकी इस काहिली का नतीजा यह निकलेगा कि एक दिन आप पंडाल सजा के बैठे रहेंगे और कोई घर से नहीं निकलेगा और कोई मल्टीनेशनल आपके ही बगल में भारी टिकट लेकर रामलीला दिखायेगा. तब आप अपसंस्कृति का रोना रोयेंगे.

वरिष्ठ लेखक और पत्रकार गोविंद सिंह के ब्लॉग http://haldwanilive.blogspot.in/ से साभार

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Comments

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