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कथा कविता
पत्थर पर दूबः सुंदर चंद ठाकुर का उपन्यास
Posted on: 2013-01-01

हिंदी के युवा कवि पत्रकार सुंदर चंद ठाकुर का पहला उपन्यास आया है- "पत्थर पर दूब." अपनी विषय वस्तु, सैन्य बैकग्राउंड और गहन शोध में ये उपन्यास हिंदी में अपनी तरह का अकेला है और उपन्यास लेखन परंपरा को एक नई धारा की ओर मोड़ने की सामर्थ्य रखता है. राजकमल प्रकाशन से छपकर आया ये उपन्यास अब बुकशॉप्स में उपलब्ध है. यहां पेश है इस नए मिज़ाज वाले उपन्यास का एक अंश, पाखी पत्रिका से साभार.


लड़कों को अकेडमी आए तीन महीने होने जा रहे थे। इस दौरान वे अगर अकेडमी से बाहर निकले थे, तो वह ट्रेनिंग के सिलसिले में ही और वह भी शहर से दूर जंगल, गाँवों की ओर। अब समय आ रहा था जब उन्हें अकेडमी के बाहर जाने का मौका मिलने वाला था। लेकिन इसके लिए भी शर्त थी कि वे पहले ड्रिल का टेस्ट पास करेंगे। ड्रिल यानी परेड। यह थोड़ा अटपटा लग सकता है। आखिर परेड में ऐसी क्या बात है, वह कोई ऐसी मुश्किल कला नहीं जिसमें पांडित्य की जरूरत हो। लेकिन यह बात अगर ड्रिल उस्ताद से पूछी जाए तो वह शिकायत करेगा कि ईश्वर ने अच्छी परेड करने वाले बहुत कम नौजवान बनाए हैं। लड़के सावधान की पॉजिशन में सीधे खड़े तो हो नहीं सकते, वे क्या परेड करेंगे? इस पॉजिशन में हाथों और शरीर के बीच सूई भी नहीं गुजरनी चाहिए, जबकि ड्रिल उस्ताद की अक्सर यह शिकायत रहती है कि इस लड़कों के हाथों के बीच से हाथी भी गुजर सकता है। ये पैर इस तरह पटकते हैं जैसे गधा दुलत्ती मार रहा हो। वह नपफासत, खुद पर वह गरूर, बदन में करंट ही नहीं। ड्रिल उस्ताद की शिकायतें गलत भी न थीं।

विक्रम को एनसीसी में छह साल परेड करने का अनुभव था। वह इस कला की बारीकियों को समझता था। ड्रिल की कक्षाओं में कई बार उसे भी अचरज होता कि आखिर लड़के बेहद साधारण बातों को भी क्यों नहीं समझ पाते। सावधान, विश्राम और कदमताल के लिए उस्ताद को बार-बार नमूना पेश करना पड़ता था। ''पैर द्घुटने से ऊपर की ओर उठेगा'' कहते हुए वह पैर को छाती तक उठाते हुए जमीन पर पटकता, वैसे ही जैसे वाद्घा बॉर्डर पर भारत और पाकिस्तान सैनिक पारस्परिक प्रतिद्वंद्विता के चलते एक-दूसरे से बेहतर प्रदर्शन करने के प्रयास में करते हैं। दोनों मुल्कों से लोग अगर सपरिवार वाद्घा बॉर्डर द्घूमने आते हैं और यह अन्यथा साधारण-सी जगह अगर टूरिस्ट स्पॉट बन गया है, तो इसकी वजह यहाँ के पफौजी संतरियों की यही आकर्षक ड्रिल है। उस्तादों के मुताबिक यही वह चीज है जो एक पफौजी की चाल-ढाल बदल देती है।

एक फौजी अपफसर जिस तरह खड़ा होता है, चलता, बात करता है, उसमें एक अनुशासन सहज ही दिखने लगता है। असल में यही ड्रिल सैनिकों में बुनियादी अनुशासन की नींव डालती है। ड्रिल स्कॉवयर में कोई लड़का एक पैर पर नहीं खड़ा होता, क्योंकि वहाँ एक पैर पर खड़े होने का मतलब अपने लिए मुसीबत बुलाना है। ड्रिल उस्ताद इतनी-सी गलती पर अपनी जेब में हमेशा रहने वाली छोटी-सी डायरी में लड़कों के नाम लिख लेते और कुछ दिनों बाद उस लड़के के खाते में दो-तीन सीएल जमा हो जातीं। ड्रिल टेस्ट की लड़के खास तैयारी करते। जैसे दुल्हन अपनी शादी की ड्रेस तैयार करती है, लड़के भी उसी उत्साह और सरोकार के साथ अपनी ड्रेस सजाते। वे चैक करते कि कमीज में किसी काज से धागे का कोई टुकड़ा तो नहीं निकल रहा, कहीं से सिलाई तो नहीं उधड़ रही। जूतों की पॉलिश का खास खयाल रखा जाता। उन्हें तीन दिन पहले ही सिविलियन अर्दली के सुपर्द कर दिया जाता। जो उन पर खास पॉलिश लगाते।

ये अर्दली बैल्ट के बकल्स, कैप के बैज जैसी चमकने वाली चीजें बाहर बाजार की किसी दुकान में ले जाते। जूतों के तले में नाल लगाई जाती थी, जिसमें चौड़े मुँह वाली सोलह कीलें होती थीं। कीलों की संख्या न कम होनी चाहिए न ज्यादा। टेस्ट के दिन इन कीलों को गिनकर ही लड़के बैरक से बाहर निकलते थे। पैंट की बांई जेब में रुमाल होना अनिवार्य था। लड़के यह कल्पना करके मरे जा रहे थे कि ड्रिल टेस्ट पास करने के बाद वे अकेडमी की सीमाओं से बाहर शहर में एक आम इंसान की तरह द्घूम-पिफर सकेंगे। विक्रम को पूरा यकीन था कि वह पहली बार में ही टेस्ट पास कर लेगा। आखिर एनसीसी की ट्रेनिंग की इतना लाभ तो उसे मिलना ही चाहिए था। मगर पिफर भी वह कोई चांस नहीं लेना चाहता था। उसने तैयारी में कोई कसर नहीं छोड़ी। पॉलिश के लिए जूते सौंपते हुए अर्दली को उसने अतिरिक्त पचास रुपये का नोट थमाया। यूनिपफॉर्म को कई बार उलट-पलट कर चैक किया। जगह-जगह से धागों के खुले सिरे मुँह से नोचकर निकाले। ऐसा करने वाला वह अकेला न था। यह अर्दलियों की पौबारह होने का वक्त था क्योंकि लगभग हर लड़का अपनी यूनिपफॉर्म को दुरुस्त करने के लिए उन्हें टिप दे रहा था।

अकेडमी से बाहर खुली हवा में निकलने के लिए वे इस कदर बेताब था कि इसकी कोई भी कीमत चुका सकते थे। तय दिन टेस्ट हुआ और दो दिन में उसका नतीजा भी आ गया। विक्रम की प्लाटून में चालीस में से पंद्रह लड़के पास हुए थे। विक्रम को पता चला कि जसामी से दीपक और नौशेरा से मनोज ने भी पहली बार में ही टेस्ट पास कर लिया था। टेस्ट पास करने वाले लड़कों का उत्साह पफेल होने वाले लड़कों की निराश पर भारी पड़ता दिख रहा था। इन लड़कों को वे जबरन कैपफे ले गए और कसाटा, आइसक्रीम, कॉपफी, गुलाबजामुन जिसने जो पफरमाइश की उसे पूरा किया गया। रविवार के दिन अकेडमी में गजब चहल-पहल दिखाई दी। लड़क़े बदन पर डियोडे्रंट का भरपूर छिड़काव कर चहचहाते हुए अकेडमी के मुख्यद्वार की ओर ऐसे बढ़ रहे थे कि जैसे वह कुछ पलों के लिए खोला गया जहन्नुम का दरवाजा हो, जहाँ से हर कोई जल्दी से जल्दी बाहर निकल जाना चाहता हो। विक्रम अपनी प्लाटून के लड़कों के साथ था। जैसे-जैसे वे मुख्यद्वार की ओर बढ़ रहे थे उनकी चहचहाहट भी बढ़ती जा रही थी। मुख्यद्वार पर लड़कों के चाल-ढाल पर गि( नजर रखने वाले लालपट्टाधारियों की संख्या बढ़ी हुई थी। मगर इसी द्वार पर उनकी हेकड़ी की सीमा समाप्त हो जाती थी। इसलिए जैसे ही लड़के मुख्यद्वार से निकलकर इन पट्टाधारियों से पर्याप्त दूरी पर आ गए, वे आजाद होने की भावना में उत्पफुल्ल हवा में तैरने लगे। उतावलापन उन पर पागलपन की तरह हावी हो रहा था।

''अबे बे बे देखो देखो, इंसान कैसा होता है'' पहुजा मुख्य सड़क पर पहुँचते ही एक आदमी को देखकर चिल्लाया और दोनों बाहें पफैलाकर दौड़ने लगा। ''ओए यही वह दुनिया है जहाँ आदमी साँस ले सकता है, हँस सकता है, गा सकता है, यह हमारे सपनों की दुनिया'' त्यागी भी दोनों हाथ पफैलाए पहुजा के पीछे हो लिया। ''हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजरब( न रह पाएँगे...'' पटना का रहने वाले सत्येंद्र ने ऊँची आवाज में हिन्दी कविता का अपना ज्ञान पेश किया। ''अब देखो बे देखो, ऐसा होता है दो पहियों वाला स्कूटर, और ऐसी होती है सवारी ढोने वाली प्यारी बस। और ये हैं महाराजाध्रिाज ट्रक.....'' तिवारी सड़क किनारे खड़ा हो सड़क से गुजरते वाहनों का परिचय देने लगा। ''कहाँ बसों-ट्रकों के पीछे पड़ा है यार, इधर देख लड़की कैसी होती है?'' के.के सामने से आ रही लड़की की ओर देख होठों पर जीभ पफेरता हुआ बोला। अकेडमी से बाहर निकल लड़के कुछ देर तक तो ऐसे ही बौराए रहे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि भीतर पींगे मार रही खुशी को कैसे व्यक्त करें। ''यार, आज हम लड़कियाँ ताडेंगे, बहुत हो गया। आँखें सूखा हुआ कुआं बन गई हैं।

कुछ तो तरावट मिले इन्हें। बाला, तू हमारा गाइड है, बता माल कहाँ दिखेगा।'' नैयर बाला को रोकते हुए बोला। साथ चल रहे हरमिंदर ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई और अपने किस्सों और हर हफ्रते डाक से आने वाले महंगे उपहारों के आधार पर लड़कियाँ पटाने में उस्ताद की छवि बनाने वाले द्घोषाल ने समर्थन किया तो बाला गंभीर मुद्रा में बोला : ''अच्छी लड़कियाँ तो अल्सा मॉल में ही मिलेंगी।'' ''ओके बॉएज, वीआर हैडिंग पफॉर अल्सा मॉल।'' बाला की बात पूरी होते ही नैयर ने द्घोषणा की। अल्सा मॉल मद्रास के शहरी धनाढषों के लिए खाने-पीने और शॉपिंग करने का अड्डा था। अकेडमी के लड़कों का भी यह प्रिय जॉइंट था। मॉल के दुकानदार इन लड़कों को उनकी डे्रस और हेयरकट से पहचान लेते थे। मॉल के बारे में सीनियर्स जूनियरों को बताते और जूनियर जब सीनियर बनते तो वे भी नए जूनियरों को वहाँ के किस्से सुनाते। इन किस्सों में कई लड़ाइयाँ भी शामिल हैं। दो साल पहले कॉलेज के लड़कों के एक ग्रुप ने अकेडमी के लड़कों से टकराने की जुर्रत की थी। लड़कों ने उनकी जमकर पिटाई की। ऐसा उन्हें अपनी शारीरिक ताकत, दिलेरी और आपसी एकता दिखाने के लिए करना पड़ा था। कॉलेज के लड़कों में एक बड़े अपफसर का बेटा भी था। अपफसर ने इसकी शिकायत कमांडेंट से कर दी। इंक्वॉयरी हुई।

सात लड़कों को पाँच-पाँच सीएल मिली। लेकिन इस किस्से में सजा वाला हिस्सा ज्यादा अहम नहीं, लड़कों को वे डायलॉग सुनकर मजा आता था, जो किस्सा सुनाते हुए कोई सीनियर मन ही मन गढ़ लेता था। मसलन उस दिन द्घूम-पिफरकर वापस अकेडमी आने के बाद सीनियर भिडे ने विक्रम के गु्रप में बैठकर अपने सीनियर से सुने किस्से को दुहराते हुए कई मनगढं़त दृश्य खींच डाले थे। ''देयर वर दोज गर्ल्स, देयर गर्लप्रफेंड्स, दे वर पुलिंग देम बैक, यू नो वट वर देयर वर्ड्‌स? दे वर क्राइंग, रिक्वेस्टिंग अस नॉट टु बीट देम। प्लीज पफॉर गोडसेक, लीव दीज गाइज। वी अपोलोजाइन ऑन देयर बिहापफ। यू आर सोल्जर्स। यू हैव बिग हार्ट्स। प्लीज पफॉरगिव देम। दे विल नॉट डू इट अगेन।'' किस्सागोई मास्टर भिडे वृतांत सुनाते हुए बोल रहा था। ''गाइज रिमेंबर वन थिंग, दिस सिटी शुड रिमेंबर अस एज ब्रेव कैडेट्स। आर सीनियर्स हेव टेकन पेन्स टु बिल्ड एन इमेज पफॉर अस, इमेज ऑपफ पिफयरलेस एंड रिलेंटलेस गाइज, द वन्स हू शुड बी पेड रेस्पेक्ट एंड नॉट जोक्ड अराउंड। वन पुलिस कॉन्सटेबल वाज ट्राइंग टु प्ले स्मार्ट ऑन अस। ही पफॉरगोट दैट ओजी इज ऑलवेज सुपीरियर टु खाकी।

हांडा गेव हिम अ स्लेप राइट आउटसाइड दैट कॉपफी शॉप इन अल्सा मॉल।'' भिडे ने कहते हुए नीचे बैठे जूनियरों के चेहरों पर आ रहे भावों का मुआयना किया। उसने जूनियरों को आउटपास पर गए लड़कों की लड़ाई के और भी किस्से सुनाए। लेकिन विक्रम के गु्रप के साथ लड़ाई जैसा कुछ नहीं हुआ। नैयर की जिद पर थोड़ी देर अल्सा मॉल में लड़कियाँ ताकने के बाद पहुजा और त्यागी गु्रप को बाहर खींच लाए थे। ''बॉस, बहुत हो गई आँखें गीली, हम अब अपने गले गीले करेंगे। जिसने बीयर पीनी हो और भुना हुआ मुर्गा खाना हो, वो हमारे साथ चले। बाला को एक अच्छा जॉइंट मालूम है।'' कॉपफी शॉप के बार आकर पहुजा ने प्रस्ताव रखा। बाला लड़कों को एक रेस्तरां में ले गया। वह दिखने में बहुत अच्छा न था, मगर सापफ सुथरा था। बाला ने काउंटर पर बैठे व्यक्ति से अपनी लोकल भ्ााषा में बात की और हाथ के इशारे से लड़कों को अंदर बुला लिया। विक्रम ने ग्रेजुएशन के अंतिम वर्ष पहली बार शराब पी थी।

सिगरेट पीनी भी उसने उसी साल शुरू की। हालांकि उसका पहली बार शराब पीने का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा था। वह होली के मौके पर अपने गायकी के शौकीन एक दोस्त के द्घर पर रखी गई पार्टी थी, जहाँ उसने पहली बार इस द्रव्य का रसास्वादन किया था। कॉलेज के लड़कों के अलावा उसमें दोस्त के बड़े भाई द्वारा आमंत्रिात गायक भी पहुँचे हुए थे। उनमें एक कर्नाटक साहब थे, जो कॉलेज के कई कार्यक्रमों में हारमोनियम लिए गाते दिखते थे। पहले होली के गानों का दौर चला- जल कैसे भरूं जमुना गहरी, जल कैसे भरूं जमुना गहरी। पहली लाइन कर्नाटक साहब गाते और पिफर पीने वाले उपस्थित लोग उसे दुहराते। धीरे चलूं द्घर सास बुरी है, ढलके चलूँ छलके गगरी, जल कैसे भरूं जमुना गहरी... दो गिलास शराब पीने के बाद विक्रम को यह गीत-संगीत दिव्य लगने लगा था। उसका कंठ लगातार खुलता जा रहा था। एक मनचले की पफरमाइश पर जब कर्नाटक साहब ने एक गजल की तान छेड़ी तो विक्रम का खुद पर नियंत्राण जाता रहा। हाल ही में मोहब्बत का खुमार चढ़ने वालों के लिए गजल थी भी गजब की-जब न माने दिल दीवाना, ढूंढकर कोई बहाना, तुम चले आना।

'आना' को कर्नाटक साहब ऐसा अलाप लेकर गाते कि वहाँ मौजूद सभी दीवाने 'वाह वाह', 'एक बार और' पुकार उठते। मस्ती की इस तरंग में विक्रम को पता ही नहीं चला कि वह कितने गिलास पी गया। वहाँ एक बड़ी-सी मेज पर शीशे के छोटे-छोटे गिलासों में बैगपाइपर मार्का किसी व्हिस्की के बने-बनाए पैग रखे हुए थे, बाकायदा पानी डले हुए। चाय की उन गिलासों को उठाकर हलक करने में वक्त ही कितना लगता। विक्रम को मस्ती के इस सुरूर में तब कुछ गड़बड़ होती लगी, जब गाने के साथ-साथ उसका उलटी करने का भी मन होने लगा। वह दूसरों के सामने खुद को पीने के मामले में इतना कमजोर नहीं दिखाना चाहता था, सो चुपचाप बाहर खिसक लिया। लेकिन बाहर रात की ठंडी हवा जैसे ही उसके चेहरे से टकराई उसका प्रतिरोध हो गया और अगले ही क्षण वह सड़क किनारे नाली में उलटियां मार रहा था। उस रात वह मल्लीताल से तल्लीताल सड़क पर किसी आम शराबी की तरह झूमता हुआ चला। अपने कमरे में पहुँचकर उसने नशे को तोड़ने के लिए तीन-चार गिलास पानी पिया और मन में ठाना कि वह अब कभी शराब नहीं पिएगा।

लेकिन अगले हफ्रते ही जब उसे दुबारा कर्नाटक साहब की गायकी में शामिल होने का न्यौता मिला, तो वह खुद को रोक न सका। वह महपिफल में तो शामिल हुआ ही, व्हिस्की की गिलासों से भी उसने परहेज नहीं किया। इस बार वह बिना उलटी किए महपिफल खत्म होने तक कर्नाटक साहब के अलापों पर झूमता रहा। पिछली बार उलटी ने उसमें शराब को लेकर अपराध्बोध भर दिया था, मगर इस बार जब उसने देखा कि वह शराबियों द्वारा दिखाए जाने वाले अपमानजनक शारीरिक-मानसिक संकेतों के बिना एक भरपूर विस्पफोटक आनंद को जज्ब कर गया, तो उसने शराब को लेकर अपनी धारणा बदल ली, वह उसका मुरीद बन गया। ''यार एक-एक बीयर और पीते हैं'' नैयर ने बोतल में बची अंतिम द्घूंट लेते हुए कहा। उसके इस प्रस्ताव को तुरंत ध्वनि मत से स्वीकार कर लिया गया। रेस्तरां में वे आठ लड़के थे, दो मेजों को जोड़कर बैठे हुए। ''तुम लोग बीयर पीओ, मैं अब जिन पिऊँगा'' द्घोषाल बोला। पहली बार अकेडमी से बाहर निकलने का उत्साह बीयर के नशे ने और बढ़ा दिया था। मगर लड़के जितना पी रहे थे, उतना ही अकेडमी की ओर लौट रहे थे।

सारी बातें-द्घूम-पिफरकर उनकी टे्रनिंग पर आ जा रही थी। ''ये मेजर गांगुली क्या बला है यार, समझ नहीं आता। लास्ट वीक ही वाज सो नास्टी ऑन अस। साले ने पूरे दो द्घंटे तक रगड़ा दिया। तुम लोग माधुरी दीक्षित के मजे ले रहे थे और हमारी वह पफाड़ने पर तुला था।'' लड़कों ने अभी-अभी एडजुडेंट रंधावा को निपटाया था। अब पहुजा ने उन भूखों के सामने एक और शिकार डाल दिया था। पहुजा को पिछले वीक तीन सीएल मिली थीं। दुर्भाग्य से इस दौरान ड्यूटी ऑपफीसर मेजर गांगुली था। ''अबे कुछ नहीं यार, वो साला सेडिस्ट है। तुझे मालूम है उसकी बीवी भी उसके साथ नहीं रहती। उसे टॉर्चर करने में ही मजा आता है। एक बार यहाँ से पास आउट हो लें, पिफर कभी अगर टकरा गया तो उससे सारा हिसाब चुकता करूँगा।'' टे्रनिंग से हमेशा त्रास्त रहने वाला नैयर बोला। गुस्सा उसकी नाक पर बैठा रहता था। ''अबे वह इतना भी खराब नहीं। मुझे लगता है हम बहुत सेल्पिफश होकर सोच रहे हैं। दूसरे अपफसरों को देख, नाइट ड्यूटी में झलक भर नहीं दिखलाते। गांगुली को क्या शौक है अपनी नींद खराब करने का। सिपर्फ यही है कि वह कामचोरी नहीं जानता। उसका काम हमें टपफ बनाना है और वह वही कर रहा है। वी शुड टेक इट पॉजिटिवली।'' विक्रम बोला। उसे ऐसा वाकई में लगता लगता भी था।

वह नहीं भूला था कि गांगुली ने ही उसे बैरक में नाइट ड्यूटी के दौरान रंगे हाथ सिगरेट पीते पकड़ा था मगर कुछ नहीं किया था। लोगों के बारे में हमारी धारणाएँ ऐसी ही निजी अनुभवों से बनती हैं। ''विक्रम ठीक बोलता है। हमको भी गांगुली बाबू परपफेक्ट बेंगॉली लगता है। तू क्या समझता है, सीएल में ड्यूटी ऑपफीसर तेरा सेवा करेगा, अबे वो सजा ही रगड़ा के लिए मिलता है। गांगुली तो अपना पफर्ज निभाता है। नहीं?'' द्घोषाल नैयर की ओर आँखें तरेरते हुए बोला। वह जिन के दूसरे पैग पर आ गया था। ''यार असली बात ये है कि हम यहाँ टे्रनिंग करने आए हैं। कुछ तो लाइपफ टपफ होगी ही। वैसे यार तीन महीने में इंप्रूवमेंट बहुत हो गई। पफर्स्ट वीक में तुझे मालूम १.२ माइल में मेरा कितना टाइम लगा। पूरा जोर लगाकर भी कभी दस मिनट से पहले दौड़ पूरी नहीं हुई और अब देख नौ मिनट के अंदर आ जाता हूँ।'' के.के. तिवारी बोला। ''रहने दे यार के.के., तेरे में कोई इंप्रूवमेंट नहीं दिखता।

पहले भी तू लास्ट आता था, अब भी लास्ट ही आता है। तेरे से ज्यादा इंप्रूवमेंट तो यादवेंद्र ने कर दिखाया है। बेचारा ड्रिल टेस्ट में पफेल हो गया, नहीं तो आज उसे भी बीयर पिलाते।'' जमनाल ने तिवारी को काटा। ''नहीं यार जमनाल, इंप्रूवमेंट तो हुआ है। खुद को ही देख, साले पहले दौड़ लगाता था तो आगे-पीछे से ध्ुआं छोड़ता था। द्घोषाल से भी कहाँ दौड़ा जाता था, मैं खुद पहले वीक १.२ माइल में आठ मिनट से ज्यादा लेता था। और रनिंग ही क्यों, सीनियरों के रगड़े ने हमें मेंटली भी स्ट्रॉन्ग बनाया है।'' विक्रम बोला। बीयर के सुरूर में हर कोई कुछ न कुछ कहना चाहता था। ''यार तुम पहाड़ियों की बात ही क्या, पता नहीं किस चीज के बने हैं, सारे पहाड़ी द्घोड़े की तरह दौड़ते हैं।'' त्यागी ने बहुत देर बाद मुँह खोला। वह बीयर की लंबी द्घूंट भरने में ही मशगूल था। ''टे्रनिंग कितनी ही टपफ हो, सब झेल लेंगे। मैप रीडिंग कॉम्पटीशन में देखा नहीं कैसे रात भर चलते रहे। बस संडे-संडे हमें आउट पास मिल जाए और हम इसी तरह सारा दर्द बीयर में डुबो दें।'' कहते हुए पहुजा ने पहले बीयर की द्घूंट भरी और पिफर सिगरेट का लंबा कश लिया। उसके चेहरे को देखकर ही लगता था कि जैसे वह सुख की गंगा में हिचकोले लेता तैर रहा हो। ''तेरे को मांगता तो मैं अकेडमी के अंदर भी तुझे बीयर दिला सकता है। सारे सीनियर तो अंदर ही प्रोग्राम करते हैं। मुझे तो डाउट है, ये मेजर गांगुली भी कभी-कभी उनके साथ बैठ लेता है।'' बाला आगे झुकता हुआ बोला। ''जरूर बैठता होगा यार, मैं यही तो कह रहा हूँ कि वह बड़ा गट्सी अपफसर है। कायदे-कानून की ज्यादा परवाह नहीं करता। ऐसे ही अपफसर लड़ाई में ट्रुप्स को प्रफंट से लीड करते हैं।'' विक्रम पिफर मेजर गांगुली की तारीपफ पर उतर आया। ''लेकिन असली लड़ाई में तो अपने कंपनी कमांडर मेजर भदोरिया ने जलवा दिखाया था। जाफ्रना के जंगलों में एलटीटीई के गुरिल्लों ने पैरा ड्रॉपिंग कर रही इसकी पूरी प्लाटून को हवा में ही उड़ा दिया था। भदोरिया टूटी हुई जांद्घ लिए दो दिन तक पेड़ पर अटका रहा।

मुझे नहीं लगता गांगुली ने कोई एक्शन देखा है।'' नैयर मुर्गे की टाँग चबाते हुए बोला। ''तो उसमें गांगुली का क्या कसूर बॉस। ऑप-रक्षक में उसकी बटालियन को भेजा ही नहीं गया। तुझे पता है गांगुली की यह पहली पीस पोस्टिंग है। वह वॉलंटियर बनकर सियाचिन गया था। दो साल एलओसी में रहा। कमांडो कोर्स भी वह कर चुका है। जमनाल ने पिफर नैयर की बात काटी। ''नैयर तू बोल तो इतना रहा है पर मुझे मालूम है तू अल्टीमेटली सप्लाई कोर में या ऑर्डिनेंस में जाएगा। ये लड़ना-वड़ना तेरे वश की बात नहीं। वैसे चिंता मत कर मैं भी तेरे साथ ही रहूँगा। इनको जाने दे इन्पफेंट्री में, बनने दे कमांडो। साला अपने से स्वीमिंग टेस्ट तो पास नहीं हो रहा, नाइन पफीट जंप में अभी भी पफट के हाथ में आ जाती है।'' त्यागी ने अपने अंदाज में बात कही। वह कई बार द्घोषणा कर चुका था कि वह सप्लाई कोर में ही कमिशन लेगा। इसके वह बाकायदा तर्क भी देता। देशभक्ति और बहादुरी के जज्बे की वह हँसी उड़ाता था। ''त्यागी देख, तू तो बोल मत। पंजाबी लालाओं की तरह मुझे हर काम में प्रॉपिफट चाहिए। साले तुझे इंटरव्यू में पास किसने कर दिया। कहीं द्घूस-वूस तो नहीं देकर आया।'' पहुजा अपनी बीयर खत्म कर चुका था और अब सिगरेट के धुंए के छल्ले बना रहा था। ''पंजाबी हूँ तो वैसी ही बात करूँगा न, तू कौन-सा गोरखाओं की तरह बात करता है।

साले पंजाबी होकर पंजाबी की पतलून उतारता है, लानत है तेरे पंजाबीपन पर।'' त्यागी हवा में हाथ उठाकर बोला। ''अबे के.के. तू साले तब से मुर्गा पाड़ने में लगा हुआ है। सप्लाई कोर में तो तेरे को जाना चाहिए।'' जमनाल के.के. के सामने से प्लेट अपनी ओर खींचते हुए बोला। बारह बजे रेस्तरां में द्घुसे लड़के चार बजे जाकर बाहर निकले। द्घोषाल ने बेहिसाब जिन पी ली थी, लेकिन वह बार-बार सबको यह कहकर आश्वस्त कर रहा था कि वह सत्राह की उम्र से शराब पी रहा है और आज तक उसे कोई पकड़ नहीं पाया, उसका बाप भी नहीं, जिसकी व्हिस्की की बोतलों से वह द्घर में ही चुरा-चुराकर पीता रहा था। लेकिन रेस्तरां के बाहर निकलने पर उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। नैयर ने भी झोंक में बीयर की तीन बोतलें खत्म कर डाली थीं। उसके साथ दिक्कत यह थी कि वह लगातार गाली-गलौज में बात करते हुए हिंसक हो रहा था। लड़कों में से किसी ने सुझाव दिया था कि उन्हें थोड़ी चायपत्ती चबा लेनी चाहिए ताकि मुँह से शराब की बदबू न आए। लड़के आउट पास में जाकर शराब पीते हैं, अकेडमी में यह किसीसे छिपा न था, लेकिन लड़कों को यह भी सुनिश्चित करना पड़ता था कि वे पकड़े न जाएँ।

उन्हें खासकर उन लालपटधारियों को डर था, जो कई बार शक होने पर मुँह सूंद्घने पर उतर आते थे। बाला ने चायपत्ती का सौ ग्राम का पैकेट खरीद लिया था। सबने मुठ्टी भर-भरकर चायपत्ती मुँह में डाली और उसे चबाते हुए सड़क पर पैदल चलने लगे। ''इतना जायकेदार मुर्गा खाने के बाद कड़वी चायपत्ती चबाना मेरे बस की बात नहीं।'' नैयर चायपत्ती मुँह से थूकते हुए बोला। ''मत खा बेटा, मूंछ वाला एसएम जब शिकारी कुत्ते की तरह तेरा मुँह सूंद्घेगा, तब देखेंगे।'' त्यागी तपाक से बोला। वह दूसरों को डराने का कोई मौका न छोड़ता था। लड़के लंबी दूरी तक पैदल चलते रहे। उन्हें सात बजे से पहले अकेडमी के मुख्यद्वार के भीतर हो जाना था। चायपत्ती का कसैला स्वाद दूर करने के लिए सबने पिफर आइसक्रीम ली। नैयर वापस अल्सा मॉल जाकर लड़कियाँ ताड़ने की जिद कर रहा था, मगर द्घोषाल इसे लुच्चों लपफंगों का काम बताकर वहाँ जाने से इनकार करता रहा। अंततः तय यह हुआ कि वे साढ़े चार बजे का मूवी शो देखने जाएं और इंटरवल में बाहर हो लें। तो इस तरह पहली आउटिंग में लड़कों ने भरपूर ऐश की। हालांकि एडी मपर्फी की कॉमेडी मूवी 'बैक टु अमेरिका' देखते हुए तकरीबन सभी लड़के ऊंद्घने लगे थे, मगर उन्हें इसका अपफसोस नहीं हुआ। हॉल में एसी की ठंडक में डेढ़ द्घंटे की उस ऊंद्घ ने उन्हें इतना प्रफेश कर दिया कि वे जिस तरह चहकते हुए अकेडमी से बाहर निकले थे, उसी तरह चहचहाते हुए वापस लौटे। लालपटधरियों ने उनके सहज हाव-भाव देख उनका मुंह सूंद्घने की जरूरत महसूस नहीं की। नरीमन हाउस में कमांडोज अब पाँचवें फ्रलोर की ओर बढ़ रहे थे। उनके इस मूव से पहले विक्रम ने तीसरे और चौथे फ्रलोर पर जबरदस्त पफायरिंग करवाई थी। तीसरे फ्रलोर की खिड़कियों से ग्रेनेड भी अंदर पफेंके गए थे। इस अंधाधुंध पफायरिंग के बाद अचानक चारों ओर सन्नाटा पसर गया था।

इमारत का ढाँचा ऐसा था कि फ्रलोर के मुख्य दरवाजे तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों के अलावा कोई दूसरा रास्ता न था। कमांडो रस्से से लेटकर खिड़कियों के रास्ते भी फ्रलोर में एंट्री कर सकते थे, मगर इसमें बहुत जोखिम था। क्योंकि आतंकवादियों के पाँचवें फ्रलोर पर छिपे हाने से वे भीतर से इन कमांडोज पर सीधा निशाना लगा सकते थे। कमांडोज की पहली हिट को कैप्टन सुनील मैथ्यू लीड कर रहा था। लेकिन वह सबसे आगे नहीं था। सबसे आगे था हवलदार धीरेंद्र। गढ़साल राइपफल्स में भर्ती हुए हवलदार धीरेंद्र को एनएसजी सेंटर में आए छह महीने भी नहीं हुए थे, लेकिन इतने कम समय में ही उसने अपने अपफसरों का दिल जीत लिया था। टे्रनिंग के दौरान उसने ऑब्सटेकल कोर्स, हर तरह की पफायरिंग और खेलों में जबरदस्त प्रदर्शन किया था। इसके अलावा सेंटर की रूटीन लाइपफ में अपफसरों ने उसका एक खुशमिजाज, जिम्मेदार और उत्साही कमांडो का रूप देखा था। ५१ स्पेशल एक्शन गु्रप के कमांडिंग ऑपफीसर ने पहली ही लिस्ट में उसका नाम डाल दिया था। ''अल्पफा वन टु टाइगर, एल्पफा वन टु टाइगर, सर मैं मेन डोर पर चार्ज लगा रहा हूँ। इट विल बी ब्लॉन इन सिक्स्टी सेंकड्स।'' कैप्टन मैथ्यू ने कर्नल विक्रम को बताया और धीरेंद्र को दरवाजे पर चार्ज लगाने का इशारा किया। धीरेंद्र ने दरवाजे की चूलों के पास दो छोटे-छोटे चार्ज लगाए और दीवार की आड़ में छिप गया। बूम! एक छोटा-सा धमकाया हुआ और दरवाजा एक ओर गिर गया। अगले कुछ क्षणों तक पिफर सन्नाटा पसर गया। हवलदार धीरेंद्र अब अपनी आड़ से निकल आया। गन की पॉजिशन सामने रख वह फ्रलोर के भीतर चला गया। उसके पीछे-पीछे कैप्टन मैथ्यू और हिट के दो और कमांडो अंदर द्घुस गए। अंदर द्घुसते ही पहले बैठक खाना था। बैठक खाने के दो ओर दो शयनकक्ष और एक किचन था। एक पतली सी गैलरी के दूसरी ओर एक और शयनकक्ष और टॉयलेट थे। ''सर लगता है इस फ्रलोर में भी कोई नहीं है, साले कहीं भी छिपे हों बचेंगे नहीं।'' कमांडो धीरेंद्र कैप्टन मैथ्यू से बोला। मैथ्यू मुस्करा भर दिया। ''अल्पफा वन टु टाइगर, एल्पफा वन टु टाइगर, सर सर्च कंपलीट। नोबड़ी इज हेयर इन दिस फ्रलोर। ओवर'' मैथ्यू ने कर्नल विक्रम को मैसेज दिया।

''टाइगर टु एल्पफा वन, टाइगर टु एल्पफा वन, बी देयर पफॉर सम टाइम। लेट द अदर हिट्स ज्वॉइन यू। मैं अब पफॉर्थ फ्रलोर पर पफायरिंग करवाता हूँ। लेट्स सी इपफ द बास्टर्डस आर हाइडिंग देयर।'' विक्रम के दिमाग में ऑपरेशन की तस्वीर अब सापफ होती जा रही थी। उसे यह देखकर तसल्ली हुई थी कि ऊपरी फ्रलोर पर। आतंकवादियों से मुठभेड़ नहीं हुई। क्योंकि अब वह उन दो फ्रलोरों को छोड़कर सारा ध्यान नीचली मंजिलों पर लगा सकता था। ''टाइगर टु डेल्टा वन एंड डेल्टा टु, डेल्टा वन एंड डेल्टा टू, पाँच मिनट बाद चौथी मंजिल पर पफायर करना है। यू केन आल्सो थ्रो ग्रेनड्स थ्रू विंडोज। हिट वन, टू एंड थ्री पाँचवें फ्रलोर पर हैं। पफायरिंग तीन मिनट चलेगी। फ्रलोर में कोई एक्शन दिखे तो प्लीज रिपोर्ट इट इमिडिएटली।'' बूम! बूम! ठांय! ठांय! ठांय! तड़! तड़! तड़! तड़! तड़! तड़! विक्रम ने बात पूरी की ही थी कि अचानक इमारत से ताबड़तोड़ गोलियां चलने लगीं। ''सर दे आर पफायरिंग'' कैप्टन बसोया चिल्लाया और उसने दीवार की आड़ से ही सामने दिख रही खिड़की की ओर पफायरिंग शुरू कर दी। पूरी मैज्जीन खाली होने के बाद ही वह रुका। ''सर दे आर इन पफोर्थ फ्रलोर, वहीं से पफायर आया है।'' बसोया दीवार की आड़ में गन में नई मैज्जीन चढ़ाते हुए बोला। इस बीच विक्रम भी क्रॉलिंग कर बरामदे में बने एक पिलर की आड़ ले चुका था। ''टाइगर टु डेल्टा वन एंड टू, ओपन द पफायर, इट सीम्स टु बी कमिंग प्रफॉम पफोर्थ फ्रलोर ओनली।'' विक्रम रेडियो पर चिल्लाया। ''डेल्टा वन टु टाइगर, डेल्टा वन टु टाइगर, सर यू आर राइट, पफायर पफोर्थ फ्रलोर से ही आ रहा है। वी हेव सीन अ पर्सन रोमिंग इनसाइड विद अ गन।'' डेल्टा वन के कैप्टन थापा ने रिपोर्ट दी। तो साले पफोर्थ फ्रलोर पर ही छिपे हुए हैं। अब सालों की लाशें ही निकलेंगी यहाँ से। विक्रम ने सोचते हुए उल्पफा वन से संपर्क किया।

यह हिट अभी पाँचवें फ्रलोर पर ही थी और बिना दूसरों के पफीडबैक के नीचे नहीं उतर सकती थी। विक्रम देख रहा था कि आतंकवादी सीढ़ियों की ओर बीच-बीच में ग्रेनेड पफेंक रहे थे। ''टाइगर टु अल्पफा वन, टाइगर टु उल्पफा वन, मैथ्यू वहीं रहना। बगर्स आर थ्रोइंग ग्रेनेड्स ऑन द स्टेयर्स। हम लोग उन्हें इनगेज कर रहे हैं। वेट पफॉर माई नेक्स्ट ऑर्डर।'' अल्पफा वन को वहीं रुकने का ऑर्डर देने के बाद विक्रम को अचानक थोड़ी राहत महसूस हुई। उसे टारगेट मिल गया था। मगर दूसरे ही क्षण उसे इस्राइली बंध्कों का खयाल आया। उसे सूचना मिली थी कि आतंकवादियों ने वहाँ छह इस्राइली बंधक बनाए हुए थे। पता नहीं उनका क्या हुआ होगा, विक्रम ने एक क्षण रुककर सोचा और सामने खिड़की का निशाना लगा एक ग्रेनेड उछाल दिया।

राजकमल प्रकाशन से आए उपन्यास पत्थर के दूब का एक अंश
लेखक- सुंदर चंद ठाकुर



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उत्तराखंड पर ढेरों साइट्स हैं, लेकिन सभी आधी-अधूरी। आपकी साइट इस गैप को भरती दिखती है। उम्मीद है आप पहाड़ की उन खबरों को भी तरजीह देंगे, जो आमतौर पर अखबारों से गायब दिखती हैं। साइट में ऑडियो फंक्शन जोरदार लगा।
- राकेश परमार, देहरादून

हिलवाणी एक बहुत ज्ञानवर्धक वेबसाइट है। यहाँ हमें उत्तराखंड से जुडी हुयी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। आपका प्रयास स्तुत्य है। बस एक सुझाव देना चाहता हूँ कि यहाँ आप कुछ आलेख गढ़वाली भाषा में भी डालें क्योंकि हमारी भाषा हमारी पहचान है। पहाड़ों कि संस्कृति बचानी है तो सबसे पहले हमारी भाषा को बचाना होगा। गुणानंद पथिक जी कि गढ़वाली कविता पढ़कर अच्छा लगा।
- साकेत बहुगुणा

good work. keep it up!
- अल्मा डबराल, दिल्ली

ये सराहनीय और सार्थक प्रयास है. गढ़वाल के रीति रिवाज व संस्कृति को और ज़्यादा प्रस्तुत करने की कोशिश हो तो बेहतर रहेगा.
- दर्शन सिंह रावत, देहरादून

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काव्यात्मक और कलात्मकता की संजीदगी लिए हिलवाणी पहाड़ की ज़श्न-ए-आज़ादी जैसा हो. शुभकामनाएं.
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Hillwani is a very refreshing wbsite with all the ingredients that a good website must have. I came to know about it from one of my friends, and I'm happy to discover such a nice wesite. Keep up the good work.
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हिलवाणी को विस्तार से देखा. बहुत ख़ूबसूरत है. पहाड़ में हरियाली बहुत सुहाती है. दिन रात मारधाड़ या भाषण की ख़बरों से अलग इस तरह की चीज़ वाक़ई बहुत अच्छी लगी.
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साइट देखी. बढ़िया है. सुधार की गुंजाइश तो लगातार बनी रहती है. मुझे लगता है कि धीरे-दीरे कंटेंट बढ़ने पर और बेहतर होगी.
- प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता

वेबसाइट अच्छी है. थोड़ी कलरफ़ुल कर दीजिए. अभी सादी लग रही है. बाक़ी शुरुआत अच्छी है.
- आभा मोंढें, बॉन

बहुत अच्छी है ये कोशिश. अच्छी लगी. दो पंक्तियों में चलता स्क्रोलर थोड़ा डिस्ट्रैक्ट कर रहा है. एक से ही काम चल सकता है.
- तस्लीम ख़ान, नई दिल्ली

हिलवाणी हमेशा गूंजती रहे. शुभकामनाएं.
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बहुत ही अच्‍छा प्रयास है सार्थक बनाये रखे.
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एक गंभीर प्रयास
- सचिन गौड़, बॉन

हिलवाणी के प्रयोग के लिए बधाई.
- ज़हूर आलम, नैनीताल

हिलवाणी के लिए बधाई और शुभकामनाएं
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- गुलशन मधुर, वाशिंगटन

ये वाकई बहुत अच्छी शुरुआत है. कम से कम मुझे अब ये पता चल पाया कि गुणानंद पथिक कौन थे. इसे लॉंच करने का शुक्रिया.
- दीपक डोभाल, वाशिंगटन

गिर्दा और विद्यासागर जी की आवाज़ सुनना ख़ास तौर से अच्छा लगा. मुझे विश्वास है हिलवाणी को पहाड़ की नई पुरानी पीढ़ियो का सक्रिय सहयोग और समर्थन मिलेगा.
- मंगलेश डबराल, दिल्ली

कंसेप्ट और कंटेंट बहुत अच्छा है. इन्हें बनाए रखें.
- रामदत्त त्रिपाठी, लखनऊ

वेबसाइट देखकर बहुत अच्छा लगा
- गोविंद सिंह, नई दिल्ली

वेबसाइट पसंद आई
- ललित मोहन जोशी, लंदन

अच्छी पहल, बधाई
- प्रोफ़ेसर गिरजेश पंत, देहरादून

बहुत बढ़िया शुरुआत. आला दर्जे की विविधता भरी सामग्री. बनाए रखें
- आनंद शर्मा, देहरादून

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