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‘मन न रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा’
कबीर ने लिखा थाः मन न रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा. धर्म चिंतन की परंपरा से विलग होकर चूर मद में डूबे बाबावाद की जैसी पोल हाल के दिनों में खुली है, उसे हिंदू धर्म परंपरा में ह्रास की निशानी और चिंता के तौर पर देखा जा रहा है. काले धंधों के बाबाओं, पोंगा पंथियों और छद्म प्रवचनकारों की टोलियों पर वृंदावन में रहने वाले प्रगतिशील विचारों के संत और व्यंग्यकार स्वामी नित्यानंद की टिप्पणी.
धर्म के नाम पर विकृतियों के प्रसार का मूल कारण ये है कि आज धर्म जैसी कोई चीज़ रह नहीं गई है. जगह जगह से संप्रदाय उठ खड़े होते हैं, कोई किसी का भी झंडा उठा लेता है और स्वयं को स्वयंभू या इच्छाधारी घोषित कर देता है. न शिक्षा दीक्षा की ज़रूरत, न आचार विचार की. शिवमूरत द्विवेदी के बारे में कहा जाता है कि पहले वह कहीं चौकीदारी करता था. उसके चालाक दिमाग में ये बात आई होगी कि वैभवशाली जीवन जीना है तो गेरुआ वस्त्र से अधिक कारगर अस्त्र कोई और नहीं. बस पहन लिया और शुरू हो गया. ऐसे तथाकथित संतों से लाभ उठाने वाले अवसरवादी भी इसी समाज से आते हैं. ये भी जांच का विषय होना चाहिए कि वे कौन लोग हैं जो उसका इस्तेमाल कर रहे थे.
जहां तक प्रतिष्ठित मठों और अखाड़ों की संन्यासी बनाने की परंपरा का सवाल है, ज्ञानी और तपस्वी संत आसानी से किसी को शिष्य स्वीकार नहीं करते. दस दस वर्ष परीक्षा लेते हैं तब कहीं शिष्य बनाकर संन्यासी बनाते हैं. परीक्षा में वैराग्य, ईश्वर के प्रति लगाव, ज्ञान की पिपास और संन्यास धर्म में निष्ठा आदि प्रमुखता से देखे जाते हैं. खरा उतरने पर ही शिष्य का भार गुरू स्वीकार करते हैं. जो थोक में चेले बनाते फिरते हैं और जिन्होंने प्रवचन को भी धंधा बनाकर रख दिया है, उन्हें संत की बजाय सम्मोहक कहना ज़्यादा सही होगा. गेरुआ वस्त्र पहनने के बाद उनकी समझ में नहीं आता है कि इस रंह से धन संग्रह कैसे किया जाए. न वे भगवा वस्त्र की मर्यादा समझते है न अनुशासन. इसकी गरिमा और आदर्श भूलकर वे श्रद्धा का शोषण करते हैं. हिंदू समाज में भगवा वस्त्र का बहुत सम्मान है. जो इस सम्मान क
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