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जल जंगल
कृषि क्षेत्र की उपेक्षा से बढ़ता पलायन
Posted on: 2013-06-17

खेती , पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी पर लंबे समय तक आत्मनिर्भर रही उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था मूलतः वनों पर आश्रित थी . मगर अंग्रेजों और बाद में हमारे शासकों द्वारा वनों से जनता के अधिकार खत्म करते जाने के चलते इस अर्थब्यवस्था ने दम तोड़ना शुरू कर दिया . “ कुमाऊं उत्तराखंड जमींदारी विनास एवं भूमि सुधार कानून ( कूजा एक्ट - 1960 ) ” के चलते कृषि क्षेत्र के विस्तार पर लगी रोक और बढ़ती कृषक आबादी के बीच परिवारों में लगातार बटती जमीन ने पर्वतीय क्षेत्र के किसानों को भूमिहीन की स्थिति में पहुंचा दिया है .

आज पहाड़ में औसतन प्रति परिवार आधा एकड़ कृषि भूमि ही किसानों के पास बची है . कृषक आबादी के भूमिहीनता की स्थिति में पहुंचते जाने और रोजगार के कोई नए क्षेत्र विकसित न होने के कारण ग्रामीणों के सामने रोटी के लिए पलायन ही एकमात्र रास्ता बचा रह गया है . उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी पहाड़ की कृषि को रोजगारपरक बनाने के लिए एक ठोस नीति बनाने के बजाय कांग्रेस – भाजपा की सरकारों ने कृषि क्षेत्र पर हमले तेज कर दिए .

कृषि क्षेत्र के लिए आधारभूत ढांचागत सुविधाएँ उपलब्ध कराने और राज्य द्वारा पूंजी निवेश को बढ़ावा देने की नीति के उलट ऊर्जा प्रदेश , इको ट्यूरिज्म और औद्योगिकीकरण के नाम पर किसानों की जमीनों को कारपोरेट घरानों और पूंजीपतियों के हवाले करने तथा जैव विविधता के संरक्षण के नाम पर ईको जोन का व्यापक विस्तार कर उन्हें अपनी परम्परागत आजीविका व जमीनों से विस्थापित किया जा रहा है .

कृषि क्षेत्र के विकास और राज्य की 70% ग्रामीण आबादी की आजीविका की सुरक्षा के लिए जिन प्राथमिक कदमों को उठाने की राज्य सरकारों से उम्मीद थी वो उनके एजंडे से पूरी तरह गायब हैं . पहाड़ में पिछड़े किस्म के भूमि सम्बन्ध और अति पिछड़ी उत्पादन पद्धति में किसी तरह के बदलाव की कोई कोशिश नहीं की गई . इसके चलते खेती 2 लगातार अलाभप्रद और अरुचिकर होती गई . राज्य बन जाने के बाद भी स्थितियों में कोई बदलाव आता न देख आज बड़े पैमाने पर किसान पलायन को मजबूर हो गए हैं . पहाड़ की खेती – किसानी को बचाने और कृषि को लाभप्रद बनाने के लिए चकबंदी अनिवार्य शर्त है .

यहाँ की छोटी व बिखरी जोतें व्यवसायिक खेती की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं . मुख्यतः महिलाओं के श्रम पर आधारित पहाड़ की यह खेती महिलाओं के सिर पर एक अलाभप्रद बोझ है . व्यवसायिक खेती की तरफ पहाड़ के किसानों को प्रोत्साहित करने , बोई गई फसल की सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसानों खासकर महिलाओं के जाया हो रहे श्रम को लाभप्रद बनाने के लिए पहाड़ में चकबंदी जरुरी है . इसके साथ ही राज्य के मैदानी क्षेत्र में भी भू-माफिया , बड़े फार्मरों के कब्जे में पड़ी सीलिंग – ग्राम समाज व गरीबों , जनजातियों की जमीनों को बाहर निकालने के लिए भी चकबंदी जरुरी है .

अलग राज्य बनाने के बाद भी पर्वतीय कृषि उत्पादों का न तो राज्य सरकारों ने कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है और न ही उनकी खरीद की गारंटी की गई है . पूरे देश में और हमारे राज्य के मैदानी जिलों में भी सरकार द्वारा कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर उसके खरीद की गारंटी के लिए सरकारी क्रय केन्द्र खोले जाते हैं . मगर पहाड़ के कृषि उत्पादों जैसे – चौलाई ( रामदाना ), राजमा , गहत , भट , मडुआ , मॉस ( उडद ), मिर्च , हल्दी , मसाले , आलू , मूली , गडेरी , अदरक , सेव , माल्टा , संतरा , आम , आडू , खुमानी आदि का न तो राज्य सरकार ने कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है और न ही इसकी खरीद की गारंटी के लिए सरकारी क्रय केन्द्र ही खोले गए हैं .

पहाड़ के किसानों की राज्य सरकार द्वारा की जा रही इस पूर्ण अनदेखी के चलते यहाँ का किसान खेती के प्रति लगातार उदासीन और हतोत्साहित होता रहा है . कठिन जीवन स्थितियों और कठोर मेहनत के बल पर पहाड़ के किसानों द्वारा पैदा किये गए इन पूरे 3 जैविक उत्पादों को कौड़ियों के भाव लुटाने के लिए उन्हें मजबूर किया जा रहा है . मैं खुद अपनी खेती में पैदा हो रहे आम को पिछले साल तक एक रूपया किलो बेचने पर मजबूर होता रहा हूँ .

हम सभी तरह के पर्वतीय कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने और उसकी खरीद की गारंटी के लिए हर विकास खंड में चार – चार सरकारी क्रय केन्द्र खोलने की मांग करते आये हैं परन्तु राज्य की कांग्रेस – भाजपा सरकारें इसकी लगातार उपेक्षा करती रही हैं . जंगली जानवरों व आवारा पशुओं के आतंक ने आज पहाड़ व भावर के किसानों का जीना दुश्वार कर दिया है . पहाड़ के किसानों ने बन्दर , सूअर , सेही , हिरन और आवारा गायों द्वारा फसलों को चौपट कर देने के चलते बड़े पैमाने पर खेती को बंजर छोड़ दिया है .

अपनी आजीविका के इस एकमात्र साधन को जानवरों द्वारा चौपट कर देने के चलते पहाड़ से बड़े पैमाने पर किसानों का पलायन हो रहा है . भावर क्षेत्र में भी हाथी व सूअर बड़े पैमाने पर किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं . इधर १५ – २० वर्षों के अंदर पहाड़ में बंदरों व सूअरों की संख्या में न सिर्फ भारी बृद्धि हुई है बल्कि ये जानवर ज्यादा आक्रामक भी हुए हैं . हल बैल पर आधारित पहाड़ की कृषि के बावजूद पूर्व भाजपा सरकार द्वारा राज्य में गो - रक्षा कानून लागू कर देने के बाद पहाड़ में गो वंश की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है . गायों की बिक्री पर लगे इस प्रतिबन्ध के चलते आवारा गायों के झुण्ड पूरे पहाड़ में फसलों को चौपट कर किसानों को तबाह कर रहे हैं .

हमने फसलों की सुरक्षा के लिए कृषि भूमि की चारदिवारी और उसके ऊपर सौर ऊर्जा करेंट की व्यवस्था करने और गो – वंश की बिक्री पर से प्रतिबन्ध हटाने के लिए गो – रक्षा कानून हटाने की मांग राज्य की सरकारों से लगातार की है मगर राज्य की किसान विरोधी कांग्रेस – भाजपा सरकारों ने इसे अब तक अनसुना किया हुआ है . 4 पर्वतीय जिलों में किसानों का खेती से विमुख होने का एक और कारण है वहाँ बृक्षों के व्यवसायिक उत्पादन पर रोक का होना . बृक्ष संरक्षण कानून १९७६ के प्रावधानों के अनुसार पहाड़ का किसान अपने नाप खेतों में भी बृक्षों का व्यावसायिक उत्पादन नहीं कर सकता है . यहाँ के किसानों को अपनी जमींन में उगे पेड़ों को काटने और बेचने का अधिकार नहीं है . पूर्णत: वर्षा जल पर निर्भर ९०% असिंचित पहाड़ की खेती का लगभग आधा भाग आज बंजर पड़ा है .

इस बंजर कृषि भूमि में चीड़ सहित कई प्रजाति के पेड़ उग आये हैं और उसने जंगल का रूप ले लिया है . पूर्णत: पलायन कर चुके परिवारों की जमीनों का भी यही हाल है . मगर बृक्ष संरक्षण कानून १९७६ पहाड़ के किसानों को इन बृक्षों के व्यवसायिक उपयोग की इजाजत नहीं देता है जिससे पहाड़ के किसान को भारी आर्थिक हानि उठानी पड़ रही है . हमने इस सवाल को बार – बार हर मंच से उठाया है कि जब पूरे देश व उत्तराखंड के मैदानी जिलों में भी किसानों को अपने खेतों में बृक्षों का व्यवसायिक उत्पादन का अधिकार है तो पहाड़ के किसान को इससे वंचित क्यों किया जा रहा है . मगर राज्य के सत्ताधारियों को पहाड़ के किसानों की इस पीड़ा से कुछ भी लेना – देना नहीं है .

अगर पहाड़ के किसानों को अपने नाप खेतों में बृक्षों के व्यवसायिक उत्पादन का अधिकार दे दिया जाय तो खेती को उनके लिए आकर्षक जरिया बनाया जा सकता है . पहाड़ की खेती को रोजगारपरक बनाने के लिए बृक्ष संरक्षण कानून १९७६ में बदलाव कर पहाड़ के किसानों को नाप खेतों में बृक्षों के व्यवसायिक उत्पादन का अधिकार देना भी जरूरी है . राज्य में एक नया भूमि सुधार कानून बनाना , भूमि का नया बंदोबस्त कराना , बेनाप बंजर जमीनों को ग्राम पंचायतों के नाम दर्ज कर उसके प्रवंध व वितरण का अधिकार पंचायतों को देकर कृषि क्षेत्र का विस्तार आज राज्य सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए .

पुरुषोत्तम शर्मा 
लेखक अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव हैं 

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उत्तराखंड पर ढेरों साइट्स हैं, लेकिन सभी आधी-अधूरी। आपकी साइट इस गैप को भरती दिखती है। उम्मीद है आप पहाड़ की उन खबरों को भी तरजीह देंगे, जो आमतौर पर अखबारों से गायब दिखती हैं। साइट में ऑडियो फंक्शन जोरदार लगा।
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हिलवाणी एक बहुत ज्ञानवर्धक वेबसाइट है। यहाँ हमें उत्तराखंड से जुडी हुयी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। आपका प्रयास स्तुत्य है। बस एक सुझाव देना चाहता हूँ कि यहाँ आप कुछ आलेख गढ़वाली भाषा में भी डालें क्योंकि हमारी भाषा हमारी पहचान है। पहाड़ों कि संस्कृति बचानी है तो सबसे पहले हमारी भाषा को बचाना होगा। गुणानंद पथिक जी कि गढ़वाली कविता पढ़कर अच्छा लगा।
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ये सराहनीय और सार्थक प्रयास है. गढ़वाल के रीति रिवाज व संस्कृति को और ज़्यादा प्रस्तुत करने की कोशिश हो तो बेहतर रहेगा.
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हिलवाणी को देखकर सुखद अहसास हुआ. अच्छा लगा कि ये काम शुरू हो पाया है.
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साइट देखी. बढ़िया है. सुधार की गुंजाइश तो लगातार बनी रहती है. मुझे लगता है कि धीरे-दीरे कंटेंट बढ़ने पर और बेहतर होगी.
- प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता

वेबसाइट अच्छी है. थोड़ी कलरफ़ुल कर दीजिए. अभी सादी लग रही है. बाक़ी शुरुआत अच्छी है.
- आभा मोंढें, बॉन

बहुत अच्छी है ये कोशिश. अच्छी लगी. दो पंक्तियों में चलता स्क्रोलर थोड़ा डिस्ट्रैक्ट कर रहा है. एक से ही काम चल सकता है.
- तस्लीम ख़ान, नई दिल्ली

हिलवाणी हमेशा गूंजती रहे. शुभकामनाएं.
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बहुत ही अच्‍छा प्रयास है सार्थक बनाये रखे.
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एक गंभीर प्रयास
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हिलवाणी के लिए बधाई और शुभकामनाएं
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- दीपक डोभाल, वाशिंगटन

गिर्दा और विद्यासागर जी की आवाज़ सुनना ख़ास तौर से अच्छा लगा. मुझे विश्वास है हिलवाणी को पहाड़ की नई पुरानी पीढ़ियो का सक्रिय सहयोग और समर्थन मिलेगा.
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