- वित्त व्यापार |
- सैर सैलानी |
- जल जंगल |
- कथा कविता |
- रंग मंडप |
- देस परदेस |
- युवा ज़िंदगी |
- झरोखे से
- उत्तराखंड शासन में नाटकीय बदलावः सुभाष कुमार फिर बने उत्तराखंड के मुख्य सचिव
- आननफानन में सौंपा कार्यभार, निवर्तमान मुख्य सचिव जैन थे अनुपस्थित
- कोका कोला प्लांट को लेकर विकासरनगर के छरबा गांव में विरोध शुरू
- गंगोत्री से उत्तरकाशी तक 100 किलोमीटर क्षेत्र इको सेंसेटिव ज़ोन घोषित
- उत्तरकाशी में विरोध, राज्य सरकार दुविधा में, केंद्र से अपील का फ़ैसला
- निकाय चुनाव में कांग्रेस की करारी हार, निर्दलीयों का दबदबा, बीजेपी को कुछ लाभ
- बिनसर अभयारण्य के 10 किमी दायरे में रिहाइश की पाबंदी, स्थानीय लोग भड़के
- वेब पत्रकारिता पर राजकमल प्रकाशन से किताब, वेब पत्रकारिताः नया मीडिया नये रुझान
- पहला पन्ना
- मुख्य मुद्दा
- झरोखे से
- फ़ोटो गैलरी
- इंटरव्यू
- आधी दुनिया
- धर्म कर्म
- आपकी रिपोर्ट
- फ़ोरम
- HW Blog
- रैबार
E-mail a Friend
पहाड़ भी कपड़े बदल रहा हैः मोहन थपलियाल

बदलते पहाड़ को लेकर प्रस्तुत लेख हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार, कहानीकार और अनुवादक मोहन थपलियाल का है. ये लेख पर्वतवाणी पत्रिका के अंक में छपा था जो उत्तरकाशी से छपती थी, बाद में दिल्ली से और जिसके मोहन थपलियाल कार्यकारी संपादक थे. मोहनजी एक जुझारू और स्वप्नदर्शी लेखक थे. अभावों में जिए, ख़ूब भटके लेकिन कभी समझौते नहीं किए. हिलवाणी में उनकी स्मृति में हम ये लेख पेश कर रहे हैं. 1992 के उस लेख में व्यक्त विडंबनाएं और चिंताएं और सरोकार 2010 में भी अहम बने हैं बल्कि उत्तरोत्तर और सघन हुए हैं. पेश है लेखः
साठ वर्ष पूर्व उत्तराखंड में मैदानी जीवन की दस्तक बहुत कम या न के बराबर थी. उस वक़्त जो थोड़ा बहुत संपर्क पहाड़ और मैदान का बनता था, वह मैदानी तीर्थयात्रियों के ज़रिए ही बन पाता था. नौकरियों पर तब बहुत कम लोग थे, इसलिए पहाड़ का पारंपरिक रहन-सहन और सांस्कृतिक ढांचा अपना मूल स्वरूप नहीं छोड़ पाया था. इससे पहले पहाड़ी जीवन के रहन-सहन में थोड़ी बहुत तब्दीली नामालूम सी थी.
बाद में जब पहाड़ के लोग मैदानों में नौकरियों पर आने लगे और मैदानों में रूखा सूखा खाकर छुट्टियों के दौरान गांवों में बन ठन कर जाने लगे. तब पहाड़ी लोगों के बीच थोड़ा बहुत रहन-सहन का तौर तरीका बदलने लगा. क्योंकि मैदान से आने वाला आदमी घर भर के सदस्यों के लिए नए नए कपड़े वगैरह भी लाता था और नए ब्रांड के साबुन, तेल, टूथपेस्ट आदि भी. 1962 में भारत चीन की लड़ाई के बाद पहाड़ों पर तेज़ी से मोटर सड़कों का निर्माण शुरू हुआ. इसी बीच हिमालय के अग्रिम हिस्सों में फ़ौजी चौकियां बननी भी शुरू हुई. देश के कई हिस्सों के सैनिक पहाड़ों पर मोर्चा संभालने के लिए आए. बाहरी लोगों की आमदरफ़्त बढ़ने के साथ साथ नए नए व्यवसाय व व्यापार भी बढ़े.
आज़ादी के बाद पहाड़ी कस्बों में पंजाबी शरणार्थी भी अपना कारोबार जमा चुके थे. ट्रांजिस्टर क्रांति के बाग पहाड़ी गांवों में जगह जगह फ़िल्मी गाने बजने शुरू हुए. छुट्टी से घर लौटते हुए हर पहाड़ी फ़ौजी के कंधे पर बजता हुआ ट्रांजिस्टर लटका रहता था. यही वह दौर था जब पहाड़ी घसियारिनों ने पारंपरिक लोकगीतों को छोड़कर फ़िल्मी धुनें गुनगुनानी भी शुरू की. पहाड़ और मैदान के बीच आमोदरफ़्त बढ़ने के साथ पारंपरिक पोशाकों का महत्व भी कम होने लगा. मसलन मिरजई, त्यूंखा, पटग्वा, अंगरखा, अचकन, फत्वी, गत्यूड़ी, तिकबंद, रेबदार अथवा चूड़ीदार पैजामा बच्चों के सलदराज आदि का चलन ख़त्म हो गया और इनकी जगह कमोबेश वही कपड़े चलने लगे जिनका चलन मैदानों में भी था यानी कोट पतलून कमीज़ ब्लाउज़ पैजामा आदि.
कालक्रम के अनुसार रहन-सहन में यह तब्दीली उन क्षेत्रों में जल्दी आ गयी थी, जहां ब्रितानी राज पहले जम चुका था. मसलन कुमाउं ने बहुत पहले नए कपड़े पहन लिए थे. उसके बाद ब्रिटिश गढ़वाल(अब पौड़ी) ने कपड़े बदले और अंत में टिहरी, चमोली और उत्तरकाशी में रहन-सहन में बदलाव आया. मीडिया कल्चर आने के बाद पहाड़ की लोक-संस्कृति को ज़बरदस्त झटका लगा. अब वहां भी टीवी वीडियो और टेपरिकार्डर फैल गए।
पहाड़ों के बहुत व्यापक और विशालकाय सांस्कृतिक परिदृश्य को टीवी के छोटे से परदे ने एकाएक ढक दिया. सस्ते और हल्के मनोरंजन ने पहाड़ी लोक-संस्कृति के मूल रंगो को बदरंग कर दिया. सांस्कृतिक मूल्यों, रीति रिवाज और प्रथाओं में गिरावट आ गई. संक्रांति के दिन अब गांवों में दमामा की नौबत नहीं बजती. डौंर बजाने वाले धामी अब नहीं रहे. हुड़का प्रचलन से बाहर हो गया. मोछंग बजाने वाले माच्छूर्या दुर्लभ हो गए. ढोल सागर जानने वाले बहुत कम लोग रह गए. पहले इलाके के अनुसार ढोल पर ‘शब्द’ बजा करते थे. बांस की लांग( असली बेडवार्त प्रथा तो इस सदी के प्रारंभ में टिहरी के महाराजा कीर्तिशाह ने बंद करा दी थी.) पर चढ़ने वाले बादी भी अब लुप्तप्राय हो गए. एगास बग्वाल के मौकों पर भैला नाचने खेलने वाले लोग अब गांवों में नहीं मिलते.
महीनों तक होली गाने का रिवाज अब टूट सा गया है. पहले बसंत पचंमी के दिन से गांव के पंचायती चौक में गीतों के झुमके शुरू हो जाते थे. अब ये प्रथा रंवाई जौनसार बावर के इलाकों को छोड़कर और कही नहीं दिखाई देती. गर्मियों के दिनों में पहाड़ों में लगने वाले कौथीग या थौल का पारंपरिक स्वरूप ख़त्म होकर अब ठेठ बाज़ारी मेलों का हो गया है. इस दौरान आर्थिक स्तर पर जो परिवर्तन हुए उनका सीधा असर भी पहाड़ी जीवन के रहन-सहन पर पड़ा.
चीनी आक्रमण के बाद सीमांत के तीन ज़िलों (उत्तरकाशी, चमोली, और पिथौरागढ़) में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू हुआ. क्रैश प्रोग्राम के तहत बहुत सारा पैसा जनता के बीच आया. ठेकेदार, इंजीनियर तथा साधारण तबके के कर्मचारियों ने भी अपने अपने हिसाब से सरकारी पैसा हड़पा जिसका सीधा प्रभाव रहन-सहन के स्तर पर पड़ना लाज़िमी था.
कुल मिलाकर मैदानी रहन-सहन ने पहाडी़ जीवन के रहन-सहन पर एक तरह का धावा बोल दिया. पीतल के गिलास, दरी और दन (गलीचे) इतिहास की चीज़ें हो गए और इनके स्थान पर कप प्लेट कुर्सी मेज और स्टील के बर्तन वहां भी नज़र आने लगे. इस आर्थिक दखल ने लोगों के पुराने सांस्कृतिक मूल्यों को तोड़ दिया. गाय भैंस पालने के बजाय वहां भी डिब्बाबंद दूध का प्रयोग चलन में आने लगा. लोगों ने हल चलाना छोड़ दिया. दिहाड़ी पर हलिया रख लिया.
खेतों की उर्वरता बनाए रखने के लिए पहले गोठ लगती थी( यानी सौ पचास पशुओं को रातभर एक ही खेत में बांधकर रखा जाता था. इस प्रकार खेत बदल बदल कर गोठ लगती थी) अब गोठ प्रथा भी लगभग ख़त्म हो चुकी है. अधिक मेहनत और कम लाभ के चलते भी कुछ प्रथाएं ख़त्म हुई हैं, इसके विकल्प में मनीऑर्डर अर्थव्यवस्था आ जाने से लोगों का जीवन थोड़ा आसान और आरामतलब हो गया. दिनभर खेतों में हाड़मांस गलाने से सीधे दूकान से राशन लाना सभी को अच्छा लगता है और जब आदमी के पास फ़ुर्सत ज़्यादा हो तब फ़ैशन उसके पास ख़ुद ब ख़ुद चला आता है. लेकिन यह फ़ैशन सांस्कृतिक ह्रास का पर्याय न बन जाए, इस बात की चौकसी हमें रखनी होगी.
-मोहन थपलियाल
Comments
Mohan ji ke is lekh ko padh kar purani yade taja ho gai. Hamare sath vidambana ye rahi ki jis tarah desh me or kome paragati ke sath-sath apni sanskiriti ko bhi kayam rakh sakhi, unke mukable hum ek dhara me bhate chale gaye or sab kuch peeche chod aaye. Mana halat bhi aise hi the magar agar desh ke door-daraj ke or pardesho wa unke rahan-shan ko dekhe to maloom padta hai ki mushkile unke samne hamare se jyada thi par phir bhi unhone apni sanskriti ko jinda rakha huaa hai. kisi bhi kom ki pahchan uski bhasha-boli, wa uske apne tour-tareeke se hoti hai lekin ek hum hai apni bhasha-boli me aapas me baat tak karne me sharm mahsoosh karte hai? apne ghar me apni boli me bate tak nahi karte. Kya koee kom bina apni bhasha-boli ke jinda rah saki?
yah hame ganbhirta se sochna hoga wa koee sarthak pahal Thapliyal ji jaise budhijeeviyo ko karni hogi.
Subhkamnaao sahit : Satendra Malkoti
bahut hi achha article hai! Thapliyalji ko sadhuwad. Aaj jab hum pahadi log aarthik roop se sampann hone lagey hain to yeh hamara kartavya hai ki hum apni sanskriti, bhasha-sahitya aur anya achhe reeti-riwajon ko revive karen. Ek-do peedhi pehley to log jobs k liye deson me bhagtey rehtey the...lekin ab to sthiti badli hai. Isliye nayi peedhi k Uttarakhandiyon ko aagey aana hoga aur apni khoti huyi bhasha-sanskriti ko bachana hoga...iske liye Thapliyal ji jaise vidwaanon ka margdarshan aawashyak hai!
apka lakh purani yadaon ko taja kar gaya. keep it up, apni boli apni sanskriti jeevan ke liya jaruri hai. thanks
darasal sanskriti ko lekar kar kai chintayein chal rahi hain agar vyapak rup main dekhein to ye chinta har us samaj ki hai jo khul raha hai kapade bhasha geet to hamesha badalte hain aur rahenge jis chij ko badalna chahiye wo hai aam admi ke halat pahar main jab se tv aaya hai bahut kuch kharab hua hai to yeh baat bhi gaurtalab hai ke pahar main communication jo uski bhaugalik stithi ke karan bahut dushkar tha wo saral hua aur pahad ke bache mukhyadhara ke pahnave bolchal aur stithiyon se rubaroo bhi hue purani chijon ka naustalgia to hamesha raha hai rahega prashna kuch naye uthain to baat baane
पहाड़ में आए बदलावों व उन बदलावों के कारण उत्तराखंड की संस्कृति में रची-बसी चीजों के बारे में जो इन बदलावों के चलते धीरे-धीरे हाशिए में चली गई हैं और कुछ उसके नजदीक हैं से रू-
थपलियालजी को याद करने के लिए आभार. उन्हें हिंदी वालों ने, हम उत्तराखंडियों ने भी बड़ी जल्दी भुला दिया है.
लेख पढ कर पुराने पहाड के बारे में सोचा जा सकाता है तथा महे याद है कि जब हम बच्चे थे तब मैदानी इलाको में रहने वाले पहाडी लोग सामूहिक रूप में इकटठे होकर एक दुसरे के मकान पर शारि
sach much lekh ko padh kar bachpan yad aa gya or ye sub cheejen deere deere hamare samne hee parivartit hui hain........
purani cheesen itni apni ho gai hoti hain ki unke prati aakarshan bana hi rahata hai.
boli, vesh-busha keshi bhi sanskriti ka darpan hota hai.pahar uttarakhand ki bhasha avm vesh-busha dono par hi sankat ka badal hai.
I needed a hanging jewelry organizer and came upon this Little Black Dress one. It's very cute. I adore the loops with velcro I can use for my bangles, bracelets and necklaces. louboutin shoes organizer looks cute hanging up. It's much cuter than the standard rectangle organizers out there. My teen niece thought it was really nice, so I bought one for her, too. Lots of storage on both sides. Great product.I absolutely love cheap louboutin shoes organizer...I actually bought two of them. I wanted something that I didn't have to open and dig through to find the jewelry I wanted to wear for the day, and the Umbra Little Black Dress Hanging Jewelry Organizer solved that problem!This jewelry organizer is perfect for my needs. I have a lot of costume jewelry which has been piled up in random boxes since my move in February. I bought thomas sabo
Follow us on:
हिलवाणी से जुड़ें
हिलवाणी, उत्तराखंड और पहाड़ों को देखने, जानने और समझने का सीधा और सरल ज़रिया. हिलवाणी आपकी वेबसाइट है. हिलवाणी से आप भी जुड़ें. अगर आपके पास है कोई दिलचस्प समाचार,विचार या फ़ोटो तो हमें भेजें. ईमेल करें shiv@hillwani.com या shalinidun@gmail.com पर.
Join Us
Hillwani is an easy way to know and reach Uttarakhand and the Hills.
Hillwani is your website
Join Hillwani
If you have any news,views or photos you find interesting.
Do send us at-
shiv@hillwani.com
joshishiv9@gmail.com
