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कथा कविता
मुकेश नौटियाल की कहानीः केदारनाथ
Posted on: 2014-01-10

जहां भी जो जिंदा नजर आ रहे थे, निकाले जा चुके। जो मर चुके, उनमें से सैकड़ों शव-रूप में दिखाई दे रहे हैं। जितने शव मलबे के ऊपर नजर आ रहे हैं, उसके कई गुना मलबे के नीचे दफन हैं। कुछ जो आधे मलबे के बाहर हैं और आधे मलबे में दबे हुए- उनके करीब जाने से गिद्ध कतरा रहे हैं। उनमें लगता है अभी जान बाकी है। इसीलिए कुत्ते उनको देखकर भौंक रहे हैं। निष्प्राण देह पर कुत्ते नहीं भौंकते। मंदिर से सटे लोगों और घरों से भी कुछ कराहें फूट रही हैं। सैलाब में भवन दब गये, लेकिन उनके अंदर कैद लोगों में से कुछ जीवित प्रतीत होते हैं। आदमी के शेष होने की हलचल वहां साफ सुनाई देती है।

रुद्र हिमालय का यह तप्पड़ आज फिर एकदम वीरान है। बताया गया है कि जो जिंदा थे, निकाले जा चुके। जो मर गये उनकी सुध बाद में ली जायेगी। जो न मरे न जिंदा नजर आये-उनके बारे में कुछ भी नहीं बताया गया। यों उनकी संख्या ज्यादा भी नहीं है। ज्यादा हो भी तो स्पष्ट नहीं है। मुर्दों ओर जिंदों के बीच होने का असल संकट यही है। यह वर्ग गिनती में नहीं आता। जो गिनती में नहीं आता, छोड़ दिया जाता है। उनको भी छोड़ दिया गया।

वातावरण की नीरवता को भेदता एक स्वर मेरी तंद्रा तोड़ देता है। भृकुट लिंग आ रहे हैं। "छम-छम' की यह आवाज उनके पैरों में बंधे घुंघरुओं की है। वे अकेले नहीं आ रहे। उनके साथ धर्मू शुक्ला भी हैं। पंडा बिरादरी के धर्मू शुक्ला भृकुट लिंग के समकालीन हैं। भृकुट जब रावल1 होते थे, तब धर्मू उनके सहयोगी थे। हजार बरस बीत गये, आज तक दोनों साथ हैं। यह अलग बात है कि केदार बाबा के प्रथम रावल भृकुट लिंग महाराज को उनके गुजरने के कई बरस बाद केदारपुरी के क्षेत्रपाल के रूप में मान्यता मिल गयी, जबकि धर्मू शुक्ला और उनकी बिरादरी की अन्य पीढ़ियां गुमनामी की खोह में खो गयीं। स्मृतियां महत्व के मुताबिक सहेजी जाती हैं। भृकुट लिंग रावल थे और धर्मू शुक्ला महज पुजारी। पुजारियों की पीढ़ियां बीत गयीं। लेकिन केदारपुरी में उनके नाम का एक पत्थर भी नहीं। पंडों की खेप चुक गयी, लेकिन किसी का नाम-निशान बाकी नहीं रहा, जबकि यही पंडे हैं जिन्होंने हजार बरस के इतिहास को अपनी बहियों में दर्ज किया। भारत भर में फैले अपने यजमानों के वंशवृक्ष को पंडों ने सुरक्षित रखा। केदारनाथ आने पर आप अपना इलाका बताइए, संबद्ध पंडा आपको आपकी सोलह पीढ़ियों का ब्यौरा उपलब्ध करवा देगा। वह आपको यह जानकारी भी देगा कि आपका कौन पूर्वज कब केदार आया, और यह भी कि उनके साथ इलाके के अन्य आगंतुक यात्री कौन थे। पंडों, यात्रियों, खच्चरों और कामगारों के साथ वे बहियां भी इस मलबे में दबी हैं।

करीब आकर भृकुट ने मुझे गौर से देखा, फिर मुस्कुराने लगे। मलबे से उठती सड़ांध से बचने के लिए मैंने अपना नाक रूमाल से ढंक लिया था। श्मशान बनी केदारपुरी के उस दुर्गंधयुक्त वातावरण में भृकुट की मुस्कुराहट मुझे चिढ़ा रही थी।

"आपको दुर्गंध महसूस नहीं हो रही?'

मेरे प्रश्न पर कान देने की बजाय भृकुट ने अपना सवाल दाग दिया-"तुम कभी रूपकुंड2 गये हो?'

"गया हूं कई बार... बीसेक साल पहले। हजारों नर कंकाल रूपकुंड के ताल में तैरते मिल जाते थे। उन पर मांस भी शेष था। अब कंकाल कम हो गये। वैज्ञानिक परीक्षण के लिए लोग बोरियों में भरकर खोपड़ियां और अस्थिपंजर ले गये। लेकिन आपने यह सवाल क्यों पूछा!'

"इसलिए कि केदार-प्रलय के जिन कारणों का जवाब ढूंढने तुम यहां आये हो, उनका सार असल में रूपकुंड की कहानी में छिपा है।' भृकुट लिंग ने जमीन को छूती अपनी पीली पड़ चुकी दाढ़ी को सहलाते हुए कहा।

मैं पूछता-कैसे, इससे पहले भृकुट स्वयं बोलने लगे-"आठ सौ साल पहले कन्नौज का राजा यशधवल हिमालय घूमने आया था। अकेला नहीं, साथ में अपनी गर्भवती रानी वल्लभा, दरबारियों की फौज और विलास के लिए नर्तकियों का लश्कर भी लाया था। वह पराक्रमी राजा था- हिमालय को अपनी हैसियत दिखाना चाहता था। रूपकुंड से ठीक पहले जो पातर नचौणिया नाम की जगह है, वहां उसने सारी रात नर्तकियों को नचाया। पातर नचौणिया में उस रात जैसे किन्नर लोक उतर आया था। पातर नचौणिया का मतलब तो जानते हो न...!'

"हां... पातर माने वेश्या, नचौणिया माने नाचने का स्थान। वेश्याओं के नाचने का स्थान...।'

"तुम जानकार आदमी लगते हो...। तब इतना और जान लो कि हिमालय वेश्याओं का नृत्य आयोजित करने के लिए नहीं बना है। यह तपस्थल है। साधकों के लिए बना है। यहां रहने का एक अनुशासन है। जो अनुशासन भंग करेगा, यशधवल की गति को प्राप्त होगा। अगली सुबह जब यशधवल आगे बढ़ने लगा तो रानी ने खराब मौसम का हवाला देकर वापस लौटने को कहा। यशधवल नाराज हो गया। वह हिमालय को फतह करने आया था, हार मानकर वापस कैसे लौटता। उसने रानी को डांटा और आगे बढ़ गया। रूपकुंड में बादल फटा। यशधवल और उसके दरबारी मलबे में दब गये। वह रानी भी दब गयी जो हिमालय के गुस्से को भांप चुकी थी। अहंकारी अपने साथ भले आदमियों को भी ले जाते हैं। यहीं देख लो- इस मलबे में सैकड़ों ऐसे श्रद्धालु भी दबे हैं जो अंतस की अतिरेक आस्था के वशीभूत केदार आये थे। केदार मोक्ष के लिए है। मुक्ति के लिए। यहां भोग के लिए जो आयेगा, वह देर-सबेर मारा जायेगा। पांडव भी यहां खपने आये थे। आदि गुरु शंकर भी यहीं समाधिस्थ हुए। सामने भैरव मंदिर से लगी वह चट्टान देखो! यह स्वर्गारोहिणी है। यहां आना स्वर्ग-आरोहण करने जैसा है। तुमने इसे मुक्ति-धाम से ऐशगाह बना दिया। जो गलती यशधवल ने की, वही तुमने भी की। रूपकुंड के कंकालों से तुमने कुछ नहीं सीखा...। कुछ भी नहीं...।'

भृकुट के चेहरे पर छलक आया क्रोध मैं अच्छी तरह महसूस कर सकता हूं। मैंने उनको वस्तुस्थिति समझाने की कोशिश की-"समय बदल गया है। हम बहुत आगे निकल आये हैं। केदारधाम अब सुगम हो गया है। हर साल लाखों यात्री यहां आते हैं। जब पूरी दुनिया आगे निकल आयी हो तब केदारपुरी हजार साल पहले कैसे थम सकती थी?'

"यह बहानेबाजी है। चाहे सब कुछ बदल गया हो, लेकिन हिमालय नहीं बदला, यह आज भी उतना ही नया और नाजुक है जितना हमारे समय में था। पर्वतों की आयु की तुलना अपनी आयु से करने की भूल मत करो। मनुष्य जल्दी में होता है क्योंकि उसके पास अंजुल भर जीवन होता है। प्रकृति अनवरत बनी रहती है। वह तुम्हारी तरह जल्दी में नहीं होती। हजारों हजार बरस में वह अपनी सुविधा के मुताबिक बदलती है। तुम इसे अपनी सुविधा के अनुसार बदलना चाहते हो। यह हरकत प्रकृति को मंजूर नहीं...।' कहते हुए भृकुट हाफने लगे। उनकी छाती का फूलता-सिकुड़ता पंजर देखकर मैं समझ गया कि वह आगे बोल पाने की स्थिति में नहीं हैं। मैंने उनसे अंतिम सवाल पूछा- "आप चाहते क्या हैं?'

"मैं तुमको साफ संदेश देना चाहता हूं...।' उन्होंने कहना शुरू किया ही था कि खांसी होने लगी। वे अनवरत खांसने लगे। खांसते-खांसते उनकी आंखें लाल हो गयीं। गले से लेकर माथे तक की नसें तन गयीं। उनकी स्थिति देखकर मैं घबरा गया था लेकिन धर्मू शुक्ला ने उनकी पीठ पर थपकियां मारनी शुरू कर दीं। यह अद्भुत उपचार था। भृकुट की खांसी थम गयी। कुछ देर तक वातावरण में अजीब सी निस्तब्धता छा गयी। तनिक सुस्ताने के बाद वे बोले- "मैं कहता हूं कि हिमालय को बाजार में मत बदलो। पर्वत को पर्वत रहने दो। नदियों को अविरल बहने दो। पशुओं को जंगल दो, पक्षियों को आसमान। साधकों को शांति बख्शो। अपने लिए नये ठौर की तलाश करो। तुम्हारे लिए धरती खुली है।'

इतना कहने के बाद भृकुट ने अपनी लाठी उठायी और धर्मू शुक्ला के कंधे के सहारे उठ खड़े हुए। मैंने उनको प्रणाम किया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किये बगैर वे अपनी कुटिया की ओर चल दिये। जल-प्रलय ने केदारपुरी में कुछ नहीं छोड़ा था- सिवाय केदारेश्वर मंदिर और भृकुट महाराज की कुटिया के। सोलह जून की रात और 17 जून की सुबह चौराबारी ताल से उतरे सैलाब में जो लोग जिंदा बचे, उनमें से अधिसंख्य ने इन्हीं दो स्थानों पर शरण ली थी।

बूढ़ाई पर मस्त चाल में चलते भृकुट को मैं तब तक देखता रहा, जब तक वे मेरी आंखों से ओझल नहीं हो गये। वापस दृष्टि लौटी तो धर्मू शुक्ला सामने खड़े थे। मैं उनसे मुखातिब हुआ-"क्या कहते हो, महाराज? केदारपुरी की यह दशा देखकर मैं तो सन्न रह गया। आपकी क्या स्थिति है?'

"केदारपुरी को प्रकृति उसके मूल स्वरूप में वापस ले आयी है। हमारे समय में यहां केवल केदारेश्वर मंदिर होता था, और कुछ नहीं। हम कच्ची झोपड़ियों में रहते थे, यात्री भी हमारे साथ घर के सदस्य की तरह रहते थे। रावलजी के लिए भी झोपड़ी बनती थी-भले वह कुछ सजी-संवरी होती थी। हरिद्वार से पैदल चलकर आया यात्री जब केदारपुरी पहुंचता था तब वह हमारा अतिथि होता था। पंडागीरी तब व्यवसाय नहीं, एक कर्तव्यबोध था। यजमान के साथ हमारा आत्मीय संबंध होता था, व्यावसायिक संबंध नहीं। केदारपुरी में तब शिवत्व बसता था। धनवान कम, निर्धन ज्यादा आते थे। केदारपुरी तब पशु-पक्षियों, जड़ी-बूटियों, सुगंधित वनस्पतियों, जलधाराओं और हिमखंडों के लिए सुरक्षित थी। इस भूमि का स्वभाव ही जन-विहीन रहने का है। जिन लोगों ने तीन टन वजनी पत्थर ढोकर यहां इतना विशाल मंदिर बनाया, वे क्या अपने लिए एक बसेरा नहीं बना सकते थे? उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वे जानते थे- हिमालय मौन के लिए आरक्षित है, स्वर कंपन यहां प्रलय लायेगा...।'

अपनी बात कहकर धर्मू शुक्ला भी लौट गये। मैंने उनको चौराबारी झील3 की तरफ जाते देखा।

अब वहां मरघट-सी शांति थी।

अचानक वातावरण में "टन्... टन्...' के स्वर गूंजने लगे। मैंने मुड़कर देखा, एक खच्चर तेजी से दौड़ता मेरी तरफ आ रहा था। उसका मुंह खुला था और वह गुस्से में लग रहा था। घोड़ा प्रजाति की ऐसी आक्रामक छवियां मैंने एमएफ हुसेन की पेंटिंग में ही देखी थीं। दौड़ते हुए उस खच्चर के गले में बंधी घंटी लगातार बजती जा रही थी।

पगलाया खच्चर सिर के बल सीधा मुझसे टकराया। जैसे ही मैं नीचे गिरा, उसने अपने दांतों से मेरी पतलून चीर डाली। किसी तरह संभलकर मैं उठा और तब तक बदहवास भागता रहा जब तक घंटी की वह आवाज मेरा पीछा करती रही।

तब से अब तक एक अंतराल बीत गया। इस दरम्यान तय हुआ कि जो न जिंदा मिले, न ही मरे पाये गये-उनको भी मरा हुआ मानकर मुआवजा दे दिया जायेगा...। शर्त बस इतनी कि मरे हुओं के जिंदा न होने का शपथ-पत्र मुआवजा प्राप्तकर्ताओं को देना होगा।

इस दरम्यान केदारघाटी इश्तहारों से पट गयी कि जो जिंदा नहीं मिले, न ही मरे पाये गये उनको जिंदा ढूंढ़ लाने वालों को उचित ईनाम दिया जायेगा। इसी दरम्यान प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री राहत कोष की तिजोरियां भर गयीं। जितनी राहत सामग्री सड़ी, उसका एक हिस्सा भूखे पर्वतवासियों में बांटा गया।

इस दरम्यान मरे हुए एनजीओ पुनर्जीवित हुए, कई नये दर्ज हुए। देहरादून से लेकर दिल्ली तक कई ठेकेदार सक्रिय हुए कि उनको दोबारा केदारपुरी बसानी है। कई अफसर पैदल चले, मंत्री जमीन पर उतरे।

और इस दरम्यान मैं लगातार उनींदा रहा कि सोऊं तो घंटी वाला खच्चर मेरी रेटीना पर हिनहिनाने लगे। इस दरम्यान वह बहुत हिंसक हो गया है।


मुकेश नौटियाल की ये कहानी द पब्लिक एजेंडा से साभार

युवा कथाकार मुकेश नौटियाल के दो कहानी संग्रह "चमकता रहेगा स्वीली धाम' और "हिमालय की कहानियां' प्रकाशित हैं। उन्होंने कविताएं और समीक्षाएं भी लिखी हैं। कार्टून, ड्राइंग और पेंटिंग से भी उनका रिश्ता रहा है।

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