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मुख्य मुद्दा
संस्थान तो आला हैं पर काम....?!
Posted on: 2014-08-21

एक और केन्द्रीय संस्थान से पहले एक बात -

भास्कर उप्रेती


17 जून 2014 को राज्य शिक्षा सचिवों की बैठक को संबोधित करते हुए केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने उत्तराखंड में ‘सेंट्रल यूनिवर्सिटी फॉर हिमालयन टेक्नोलॉजी’ की घोषणा की. इसके बारे में उन्होंने कहा कि इसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ काम करेंगे.मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में ईरानी की यह पहली बड़ीघोषणा थी.हालाँकि केन्द्रीय विश्वविद्यालय की यहघोषणा बाद में पेश हुए बजट में दूसरे ही रूप मेंप्रकट हुई.

बजट में हिमालयन टेक्नोलॉजी इंस्टिट्यूट सामने आया,जिसकेतहत100 करोड़ रुपए का प्रावधान हुआ है. हैरानी की बात थी कि केन्द्रीय मंत्री की घोषणा से उत्तराखंड के पाँचों लोक सभा सदस्य अनभिज्ञ दिखे. जब भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से देहरादून के पत्रकारों ने इस संबंध में बात की तो उन्हें इसका ब्यौरा नहीं मालूम था. लोगोंमेंभी इस बात की उत्सुकता अधिक थी यह घोषणा इतने उत्साह और पहलकदमी के साथ क्यों की गयी. लोगों के जेहन में यह बात तो रही ही होगी कि पहले से मौजूद केन्द्रीय संस्थानों की क्या गति है. नया संस्थान 100 करोड़ की लागत से बनेगा, लेकिन यहाँ तो कई केन्द्रीय संस्थान ऐसे हैं जिनका सालाना बजट ही 100 करोड़ से अधिक का है.

बहरहाल अब उत्तराखंड में एक और केन्द्रीय संस्थान होगा. इसका स्वागत है. इसके समय, स्थान, औचित्य और प्रासंगिकता पर बात करें, इससे पहले मौजूदा केन्द्रीय संस्थानों की थोड़ीपड़ताल कर ली जाए. उत्तराखंड में इतने केन्द्रीय संस्थान हैं, जितने सभी हिमालयी राज्यों के जोड़कर भी नहीं हैं. और किसी बड़े राज्य मसलन उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात आदि भी इस मायने में उत्तराखंडकी बराबरी में नहीं ठहरते.केन्द्रीय संस्थानों पर होने वाला सालाना खर्च जोड़ लें तो यह राज्य के सालाना बजट से कम नहीं होगा. और देहरादून तो देश का ऐसा नगर हैं, जहाँदेश के सभी नगरों से अधिक शोध संस्थान हैं.

उत्तराखंड में मौजूद केन्द्रीय संस्थान राज्य के बारे में बड़ी खुशनुमा तस्वीर पेश करते हैं. मसूरी में आई.ए.एस.(एल.बी.एस.) को ट्रेनिंग देने वाला संस्थान, देहरादून में सेना के सर्वोच्च सेना अधिकारियों (आई.एम.ए.) और आई.एफ.एस.(आई.जी.एन.एफ.ए.) को ट्रेन करने वाला संस्थान.दिल्ली के लाल किले, आगरा के ताज महल जैसे एतिहासिक महत्व के भवनों की रखवाली भी देहरादून के भारतीय पुरातत्व सर्वे से होती है और उत्तराखंड के आस-पास के पांच राज्यों का वानस्पतिक, जीव-जंतु औरनृतत्वशास्त्रीय अध्ययनक्रमशःबोटैनिकल, जूलॉजिकल और एंथ्रोपोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से होता है. औपनिवेशिककाल में उत्तराखंड में स्थापित सर्वे ऑफ इंडिया, इम्पीरिकल फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट (अब फोरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट), इंस्टिट्यूट ऑफ वेटनरी रिसर्च(आई.वी.आर.आई.) एक तरह से पूरे दक्षिण एशिया के पुरोधा संस्थान हैं. 1947 और फिर 1972 में औपनिवेशिकभारत से उद्भूत हुए तीन राष्ट्रोंभारत, पाकिस्तान और बांग्ला देश के पहले-पहले सेनाध्यक्ष देहरादून स्थित राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज (आर.आई.एम.सी.) में साथ पढ़े थे.और पहली लड़ाई में जनरल करियप्पा और जनरल मूसा तो आमने-सामने थे.

देहरादून के एफ.आर.आई. में तो आज भी बांग्ला देश, भूटान, श्रीलंका, म्यांमारआदि के सर्वोच्च वन अधिकारी तैयार किये जाते हैं. एककरोड़ की आबादी वाले राज्य में इस समय 70 से अधिक केन्द्रीय संस्थान हैं.रक्षा उपकरणों, मिट्टी की गुणवत्ता, ग्लेसिअर से लेकर अंतरिक्ष की गतियों पर नज़र रखने वाले सब तरह के संस्थान इनमें शामिल हैं. जिन संस्थानों के कारण उत्तराखंड शोध और अनुसंधान की दुनिया में सुर्खियां बटोरता रहा है उनमें एल.बी.एस. (मसूरी), आइएमए, सर्वे ऑफ इंडिया, वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया,ओ.एन.जी.सी., इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पेट्रोलियम,एफ.आर.आई., इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ रिमोट साइंस, वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (देहरादून), एरीजऔर आई.वी.आर.आई. (नैनीताल), विवेकानंद कृषि अनुसंधान संस्थान और जी.बी. पन्तहिमालय पर्यावरण और विकास संस्थान (अल्मोड़ा), नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी,सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट (रुड़की), नेहरु इंस्टिट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (उत्तरकाशी) प्रमुख हैं.रुड़की स्थित रुड़की कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग को हाल के दिनों में आई.आई.टी. कर दर्जा मिला है.जबकि एरीज की ओर से मुक्तेश्वर में एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन लगायी जा रही है.

काशीपुर में आई.आई.एम., ऋषिकेश में एम्स और श्रीनगर में एन.आई.टी.स्थापित हुए हैं. गढ़वाल विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला है.वाडिया इंस्टिट्यूट में हिमालय सेंटर फॉर ग्लेसिओलोजी बना है.पिथौरागढ़ में जनरल बी.सी. जोशीविद्यालयकाम करने लगा है.टिहरी में हाइड्रोपावर यूनिवर्सिटी और हरिद्वार में केन्द्रीय ग्रामीण विकास संस्थान प्रस्तावित हैं. उत्तराखंड को इस नज़र से देखें तो अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय की यह धारणा झूठी महसूस होती है कि भारत सरकार आर. एंड. डी. (शोध और विकास) कार्यों में खर्च नहीं करती.लेकिनउत्तराखंड को छोटी ही इकाई भी मानें तो क्या यह सच के करीब है? औपनिवेशिक काल में अंग्रेज जिस सबसे अहम संस्थान को कोलकाता से देहरादून उठा लाए सर्वे ऑफ इंडिया वह पूरी तरह लड़खड़ा रहा है.

पुरानी तकनीक गूगल अर्थ के आगे घुटने टेक रही है.एफ.आर.आई. से‘दि फोरेस्टर’ नामक मशहूर जर्नल निकलता था, जो पूरी दुनिया में फोरेस्ट्री साइंस का नंबर एक जर्नल था. आज उसकी गिनती अंडर टेन में भी नहीं होती.एरीज स्थित सम्पूर्णानन्द दूरबीन जंक खा रही है.अब आई.आई.टी. हो चुके रूड़कीकॉलेजऑफ इंजीनियरिंग के बारे में कहा जाता है कि औपनिवेशिक काल में इसने पंजाब (पाकिस्तान और हिंदुस्तान दोनों हिस्से) में नहरों का जाल बिछाने का काम किया, जिससे यह क्षेत्र बड़ी आबादी की भूख मिटाने में कामयाब हो सका.अब इसके विशेषज्ञ विवादित परियोजनाओं को हरी झंडी देने के सिवा क्या कर रहे?फ़ॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफ.एस.आई.) के हजारों वैज्ञानिकों की टीम दो साल में एक रिपोर्ट जारी करती है, जिसमेंवनों की अद्यतन स्थिति बताने का दावा किया जाता है. लेकिनढ़ेरों तकनीकी खामियों के चलते यह मीडिया-ट्रायल में ही प्राण गँवा बैठतीहै.

पूरे दक्षिण एशिया का सबसे प्रतिष्ठित वन्य जीव संस्थान (वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया) का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट है, अफ्रीका से भारत में चीते लाना. चीते क्यूंकि अब भारत भर से लुप्त हो चुके हैं, इसलिए ईको-सिस्टम में उनकी पुनर्बहाली जरूरी बताई जाती है.इस संस्थान का दूसरा बड़ा काम है वन्यजीव विहारों में बाघ-तस्करों पर निगरानी केलिए वहां सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाना. जिसके बारे में यह जुमला मशहूर हो गया है कि जब से कैमरे लगे तब से तस्कर अधिक सक्रिय हो गए हैं. अधिक बाघ मारे जा रहे हैं.यह संस्थान उत्तराखंड में रिकॉर्ड संख्या में मारे गए तेंदुओं (गुलदार) की हिफाज़त के लिए आज तक कोई तरकीब नहीं बता पाया है, जहाँकियह स्थित है. विवेकानंद कृषि अनुसंधान संस्थान और जी.बी. पन्तहिमालय पर्यावरण और विकास संस्थान (अल्मोड़ा) के बारे में कहा जा सकता है कि जब से ये बनाये गए हैं तब से पहाड़ से पलायन की दर कई गुना हुई है.लोगोंको कृषि में भविष्य तलाशने का कोई उपाय ये नहीं सुझा पाई हैं.

इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च (आई.सी.ए.आर.) से फंडेड गोविन्द बल्लभ कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय पंतनगर को भी इस तबाही का हिस्सेदार बताया जा सकता है, क्यूंकि इस विश्वविद्यालय के एक्सटेंशन सेंटर पहाड़ में भी दर्जनों स्थानों में बनाये गए हैं.इस विश्वविद्यालय के रानीचौरी परिसर को हाल में पृथक कर एक और विश्वविद्यालय हॉर्टिकल्चर यूनिवर्सिटी की स्थापना की गयी है.देहरादून स्थित सेंट्रल साइल एंड वाटर कंजर्वेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर मृदा क्षमता और क्षरण पर शोध कर रही है. इस क्षेत्र में यह देश की सर्वोच्च संस्था है.यहाँ फिर से आश्चर्य होता है कि यह संस्था अपने ही गृह राज्य की मिट्टी की हिफाजत के उपाय नहीं कर पायीं. और न ही यहाँ के वैज्ञानिक समुदाय में इस लोकव्याप्त चिंता की चिंता है.जेड.एस.आई., बी.एस.आई., ए.एस.आई. और एपी.एस.आई. की चतुष्पदी तीन-चार दशक पूर्व इसके संस्थापकों द्वारा किये काम को ही बार-बार दोहरा रही हैं.कोई नया जंतु, कोई नई वनस्पति नए दौर के वैज्ञानिकों ने खोजी हो ऐसा संज्ञान में नहीं आता.और ए.एस.आई. भी एतिहासिक धरोहर के संरक्षण और इस विरासत को शिक्षण में बदलने में नाकाम रहा है.

एतिहासिक स्थलों पर हमें इस संस्था के बोर्ड के अलावा कुछ नहीं दीखता. डी.आर.डी.ओ. के अधीन आने वाले ढेरों रक्षा संस्थानों की हालत तो सबसे बुरी है.इनके नाकारेपने की वजह से ही अब रक्षा क्षेत्र को एफ.डी.आई. के लिए खोलने का मौका केंद्र सरकार को मिला है.तेजस विमान के लिए एक सर्च कैमरा बनाने के अलावा कोई दूसरी बात मुझे नहीं सुनाई दी.देशके सबसे बड़े पी.एस.आई. (नवरत्न और नवरत्न में भी महारत्न) ओ.एन.जी.सी. का एक छोटा सा योगदान मुझे देहरादून नगर के लिए यह दिखाई दिया कि इसका केशव देव मालवीय सभागार हमेशा श्रेष्ठ नाटकों को नगरवासियों के लिए मुहैया कराता है और नगर की नाट्य संस्थाओं को भी जी खोलकर आर्थिक सहयोग करता है.

देहरादून में मुख्यालय होने के कारण इसका विशाल राजस्व राज्य के आर्थिक आकड़ों को भी तन्दुरुस्त कर देता है. और कुल मिलाकर राज्य भर के केन्द्रीय संस्थानों में कार्यरत मोटी पगार लेने वाले हजारों वैज्ञानिकों के वेतन-योग से राज्यवासियों का भी सैलरी-स्लैब ऊपर चढ़ जाता है. मैं केन्द्रीय संस्थानों की उपादेयता पर इसलिए भी अपनी भड़ास निकाल रहा हूँ क्यूंकि मैंने पूरे पांच साल देहरादून के केन्द्रीय संस्थानों की खाक छानने में बिताये हैं. राज्य में पैदा हुए नागरिक के रूप में मेरे लिए यह अत्यधिक गर्व की बात थी कि हमारे यहाँ विज्ञान, पर्यवरण, कृषि, भू-विज्ञान, वन विज्ञान आदिपर काम करने वाली कई संस्थाएं हैं, जिनका संबंध सबसे पहले तो इसी राज्य के जनजीवन की गुणवत्ता सुधारने से बनता है. लेकिन जब भी मैं खबर की तिजारत के लिए यहाँ के नामी वैज्ञनिकों के आगे बैठता तो मायूस हो जाता. कई बार ये लगता कि इन्हें तो उतना भी नहीं पता, जितना गाँव के अपढ़ को मालूम है.जबकि इन्हें सरकार ने गहन शोध और सुझाव के लिए प्रशिक्षित और तैनात किया है.

मुझे बार-बार यही महसूस होता कि समाज के प्रति संवेदनशील हुए बगैर विज्ञान नहीं हो सकता.हमारे पास जो वैज्ञानिक हैं उनका भावनात्मक लगाव अपने जन से नहीं है. इसलिए उनके सामने समस्यायें नहीं आतीं और जहाँ समस्याएं नहीं वहां खोज किस बात की. हालाँकि, अपनी भड़ास के साथ मैं ये भी बात जोड़ना चाहूँगा कि हो सकता है सरकारों की उदासीनता के कारण इन संस्थानों को लकवा मार गया हो. या हो सकता है बावजूद तमाम दिक्कतों के कुछ संस्थान देश के किसी भी हिस्से के लिए कोईउपयोगी बात बता पाए हों. और हो सकता है किसी एक संस्थान के लगभग कबाड़ हो जाने के बावजूद वहां कोई समर्पित और संवेदनशील वैज्ञानिक बचा हो और अपना काम लगन से कर रहा हो.

ऐसे अपवाद हैं भीऔर यहीं हमारे संस्थानों की प्रासंगिकता का आशावाद भी है.ऐसे में यह जानना जरूरी लगता है कि खुद सरकारें इन संस्थानों से क्या चाह रही हैं. यह चाहत जनता की चाहत से कहाँ मेल खाती है? बहरहाल,हिमालयन स्टडी सेंटर बनना है.हम उत्तराखंड के लोग आशा करते हैं कि यह संस्थान हिमालयी मुद्दों पर अच्छा काम करेगा, जिससे नीति-नियंताओं को नीतियां बनाने में मदद मिलेंगी. किसानी, बागवानी और पशुपालन लाभकारी होगा.यह सकल रूप ले इससेपूर्व केन्द्र और राज्य सरकार को कुछ मौजू बिन्दुओं पर अपना मंतव्य बनाना चाहिए. जैसे क्या हिमालयी क्षेत्र में विकास संबंधी नीतियां नहीं हैं या उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति की कमी है? जैसे जो केन्द्रीय संस्थान पहले से उत्तराखंड में हैं उन्होंने अब तक क्या-क्याअध्ययन किये हैं? उनअध्ययनोंपर सरकार ने गौरकिया? और यह भी कि क्या बहुत सारे अध्ययनों के बाद ही और उन्हें क्रॉसचेक करके ही सरकार अपने कदम आगे बढाती है?

क्या यह भी एक बात नहीं कि जब यहाँ कोई केन्द्रीय संस्थान नहीं था, हिमालय स्वस्थ और समृद्ध नहींथा? हिमालय में आजीविका, पलायन और पर्यावरण संबंधी दिक्कतें थीं और किस प्रकृति कीथीं? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारें पहले पैरों में कुल्हाड़ी मारती हैं, फिर उसका ईलाज ढूँढने निकलती हैं? एक और बड़ी चिंता सताती है; यह कि जब भी कोई बड़ा संस्थान, स्कूल, विश्वविद्यलय, परियोजना, हाईवे बगैरा राज्य में आताहै तो यहाँ की सीमित कृषि भूमि (जो अब 7 प्रतिशत से कम रह गयी है) पर मार पड़ती है. कोई संस्थान मिलते ही लोगों के जेहन में सवाल उठता है कि इसे कहाँ बनाया जा रहा देहरादून में या पहाड़ में?

दूसरा यह कि जमीन कौन देगा? कौन सा गाँव या किस गाँव का पनघट इसके लिए उजाड़ा-उखाड़ा जाएगा?क्या केंद्र और राज्य सरकार मिलकर यह तय नहीं कर सकतीं कि ऐसे नए संस्थानों के लिए केंद्र वन भूमि का दान भी साथ ही कर दे. ताकि समय रहते जो बनना है बन जाए औरकृषि का रकबा परिवर्तित न हो. केंद्र सरकार से अधिक चिंतन संसद में इस भूगोल का प्रतिनिधित्व करने वाले जनप्रतिनिधियों,मौजूदा संस्थानों और विश्वविद्यालयों को करना होगा.कृषि क्रांति के लिए उत्तरदायी विश्वविद्यालय को हमने किस हाल में ला छोड़ा है! हमने आवारा उद्योगों के लिए इस संस्थान की कुर्बानी दे दी.ऐसा क्यों है कि कभीकृषिविज्ञान का मक्का कही जाने वाली इस यूनिवर्सिटी के लिए कोई काबिल कुलपति नहीं मिल पा रहा है.

आई.वी.आर.आई. कामुख्यालयकिनहालातों में मुक्तेश्वर से बरेली चला गया, जबकि हम खुद को पशुचारक समाज कहते थे.हमारे लिए अपनी भूमि पर बने केन्द्रीय संस्थान इतने बेगाने क्यों होने लगते हैं? राज्य सरकार को क्या विकास के अपने विजन को जांचने या ठीक-ठीक शक्ल देने की भी जरूरत नहीं. राज्य बनने के बाद हमारे यहाँ 20 से अधिक विश्वविद्यालय हो गए हैं, जिनमें मेडिकल, इंजीनियरिंग, वानिकी, औद्यानिकी के भी विश्वविद्यालय जुड़ेहैं.कुछ लोग कहते हैं कि गढ़वाल विश्वविद्यालय को केन्द्रीय बनाकर राज्य ने तीस साल में मुश्किल से खड़ी की जा सकी एक विरासत को गँवा दिया और स्वामी मन्मथन ने जो कल्पना की थी, उसकोधूल में मिला दिया.ऐसा क्यों है कि जब गढ़वाल और कुमाऊं दोनों पर्वतीय विश्वविद्यालय पूरी तरह विपन्न थे, यहाँ से खूब मेधा आई, लेकिन जब राज्य बन गया, संसाधन भी जुट गए, हमप्रो. डी.डी. पन्तजैसेसमर्पित शिक्षकों को उनमें नहीं जोड़ सके.बैंग्लोर मेंसेवा दे रहे वैज्ञानिक और शिक्षक प्रो. खड्ग सिंह वल्दिया ने कुछ दिन पहले पीड़ा व्यक्त की कि मैं राज्य बनने से उत्साहित होकर सरकार के पास गया और मैंने अपने सुझाव देने चाहे.लेकिन कुछ समय बाद मुझे पद्मश्री दिला दी गयी और मेरे सुझाव आज भी मेरी जेब में हैं. शायद संस्थानों को प्राणमयकरने के लिए भवनों से अधिक उपयोगी बात भावना की है.हम कोई बिल्डिंग इसलिए खड़ा करना चाहते हैं कि हमें ‘विकास’ दिखाना है या हम उसे किसी परिवेश के लोगों की जरूरत का सामान बनाना चाहते हैं, यह मामूली सा फर्क है.

हिमालयन टेक्नोलॉजी इंस्टिट्यूट के जो भी कर्ता-धर्ता होंगे उनसे ये उम्मीद की जाती है कि वे वन आन्दोलन, नशा विरोधी आन्दोलन, चिपको आन्दोलन, छीनो झपटो आन्दोलन, बीज बचाओ आन्दोलन,वनअभ्यारण्यों के खिलाफ हुए आंदोलनों, टिहरी बाँध विरोधी आन्दोलन, गढ़वाल की तमाम नदियों में बन रहे और प्रस्तावित विद्युत् परियोजनाओं के विरोध में हो रहे आंदोलनों, फलेंडा क्षेत्र के आंदोलनों, नदी बचाओं आन्दोलन, छोटी-बड़ी संस्थाओं आदि के प्रयोगों के पर्चे, पोस्टर, गीतऔर मांग-पत्र जरूर पढ़ेंगे. इनमेंउन्हेंहिमालयी क्षेत्र के लोगों की आकांशा, ज़ज्बा, पीड़ा और दृष्टि मिलेगी.यहाँ के लोग किस तरह का विज्ञान और विकास चाहते हैं उसका खाका इन सब में होगा.

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उत्तराखंड पर ढेरों साइट्स हैं, लेकिन सभी आधी-अधूरी। आपकी साइट इस गैप को भरती दिखती है। उम्मीद है आप पहाड़ की उन खबरों को भी तरजीह देंगे, जो आमतौर पर अखबारों से गायब दिखती हैं। साइट में ऑडियो फंक्शन जोरदार लगा।
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हिलवाणी एक बहुत ज्ञानवर्धक वेबसाइट है। यहाँ हमें उत्तराखंड से जुडी हुयी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। आपका प्रयास स्तुत्य है। बस एक सुझाव देना चाहता हूँ कि यहाँ आप कुछ आलेख गढ़वाली भाषा में भी डालें क्योंकि हमारी भाषा हमारी पहचान है। पहाड़ों कि संस्कृति बचानी है तो सबसे पहले हमारी भाषा को बचाना होगा। गुणानंद पथिक जी कि गढ़वाली कविता पढ़कर अच्छा लगा।
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ये सराहनीय और सार्थक प्रयास है. गढ़वाल के रीति रिवाज व संस्कृति को और ज़्यादा प्रस्तुत करने की कोशिश हो तो बेहतर रहेगा.
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हिलवाणी को विस्तार से देखा. बहुत ख़ूबसूरत है. पहाड़ में हरियाली बहुत सुहाती है. दिन रात मारधाड़ या भाषण की ख़बरों से अलग इस तरह की चीज़ वाक़ई बहुत अच्छी लगी.
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साइट देखी. बढ़िया है. सुधार की गुंजाइश तो लगातार बनी रहती है. मुझे लगता है कि धीरे-दीरे कंटेंट बढ़ने पर और बेहतर होगी.
- प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता

वेबसाइट अच्छी है. थोड़ी कलरफ़ुल कर दीजिए. अभी सादी लग रही है. बाक़ी शुरुआत अच्छी है.
- आभा मोंढें, बॉन

बहुत अच्छी है ये कोशिश. अच्छी लगी. दो पंक्तियों में चलता स्क्रोलर थोड़ा डिस्ट्रैक्ट कर रहा है. एक से ही काम चल सकता है.
- तस्लीम ख़ान, नई दिल्ली

हिलवाणी हमेशा गूंजती रहे. शुभकामनाएं.
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बहुत ही अच्‍छा प्रयास है सार्थक बनाये रखे.
- विमलेश गुप्‍ता, शाहजहांपुर

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एक गंभीर प्रयास
- सचिन गौड़, बॉन

हिलवाणी के प्रयोग के लिए बधाई.
- ज़हूर आलम, नैनीताल

हिलवाणी के लिए बधाई और शुभकामनाएं
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'हिलवाणी' बहुत अच्छी लगी - एक सुखद आश्चर्य जैसी. एक नज़र सभी पृष्ठ देख गया हूं. समाचार, कथा-कहानियां, कविताएं, साक्षात्कार, सभी कुछ तो है. बहुत सुंदर शुरुआत है.
- गुलशन मधुर, वाशिंगटन

ये वाकई बहुत अच्छी शुरुआत है. कम से कम मुझे अब ये पता चल पाया कि गुणानंद पथिक कौन थे. इसे लॉंच करने का शुक्रिया.
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गिर्दा और विद्यासागर जी की आवाज़ सुनना ख़ास तौर से अच्छा लगा. मुझे विश्वास है हिलवाणी को पहाड़ की नई पुरानी पीढ़ियो का सक्रिय सहयोग और समर्थन मिलेगा.
- मंगलेश डबराल, दिल्ली

कंसेप्ट और कंटेंट बहुत अच्छा है. इन्हें बनाए रखें.
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वेबसाइट देखकर बहुत अच्छा लगा
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वेबसाइट पसंद आई
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अच्छी पहल, बधाई
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बहुत बढ़िया शुरुआत. आला दर्जे की विविधता भरी सामग्री. बनाए रखें
- आनंद शर्मा, देहरादून

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