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आधी दुनिया
पहाड़ी महिलाओं के श्रम की कहानी
Posted on: 2014-11-25

             महिलाओं के श्रम का ये वृतांत और रिपोर्ताज भेजा है भास्कर उप्रेती  ने .



सांस तोड़ती अर्थव्यवस्था में प्राण फूंकती सल्ट की महिलाएं

 
अक्टूबर 15 तारीख के लिए मुझे और मेरे मित्र डॉ. विनोद पाण्डे (आई.वी.आर.आई. में वैज्ञानिक) को सल्ट से रचनात्मक महिला मंच का न्योता आया. ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ की तर्ज पर ‘अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस’ मनाने ये महिलाएं स्थानीय बद्रीनाथ मंदिर (रैक्वासी गाँव) के प्रांगण में इकठ्ठा थीं.


करीब 30 वर्ग किलोमीटर तक के दूर-दूर छिटके तोकों से यहाँ पहुंची थीं, आठ गाँवों की करीब 450 कृषक महिलाएं. यहाँ उन्होंने अपने गांवों में उगाये जाने वाले अनाजों के बीज रखे थे, उनसे बनने वाले व्यंजन भी वे वहीँ पास में लगे चूल्हों में बना रहीं थीं. महिलाओं ने अपने स्टालों में मंडुआ, हल्दी, अदरक, भंग्जीर, मिर्च आदि के पैकेट भी रखे थे, जिन पर श्रम उत्पाद की चिट थी. यहाँ स्थानीय अदरक, लहसुन, आम और और आंवलों के बने अचार भी थे. लेकिन हमारे लिए यह देख पाना बड़ा सुखद था कि यह सब आयोजन किसी को दिखाने या प्रदर्शन के लिए नहीं था, बल्कि उनके जीवन का वास्तविक था.

सारा आयोजन महिलाओं ने खुद की कमायी से किया था. मंच खासा आकर्षक था. और सबसे ज्यादा आकर्षक था, विभिन्न महिला समूहों द्वारा प्रस्तुत गीत और नृत्य. ये गीत निहायत लोकल थे. जो और कहीं नहीं, यहीं सुने जा सकते थे. उनमें इतनी रूमानियत थी जितनी तीखी धार से बोझ ले जाती महिला को हवा का हल्का झोंका पाने से होती है. ये गीत मेहनत का पसीना छुपाने वाले नहीं, दिखाने वाले गीत थे. महिलाओं में जो नैसर्गिक एका यहाँ छलक रहा था, वह वाकई विस्मित कर देने वाला था. यहाँ महिलाओं के दो खास मेहमान भी थे. स्पैक्स संस्था देहरादून के डॉ. बृजमोहन शर्मा और ‘बीज बचाओ आन्दोलन’ टिहरी के विजय सिंह नेगी यानी बीजू भाई. इन दोनों से महिलाओं को अच्छी और टिकाऊ खेती के गुर सीखने थे. दरअसल जीवन में अपनी खुद की कमाई से उत्साहित और आपस में संगठित ये महिलाएं आत्मविश्वास से लबरेज थीं. और आज के पहाड़ में इस तरह का दृश्य थोड़ा विस्मयबोधक था.

रचनात्मक महिला मंच की संयोजक गीन्ग्ड़े गाँव की देवकी देवी, महिलाओं की पहल पर चुनाव लड़ीं और अब ग्राम प्रधान बनीं जमुना देवी, रैक्वासी गाँव की विमला देवी, काने गाँव की सरी देवी जैसी समूहों की सक्रिय महिलाओं से बात करने के बाद हमें इस ‘छोटी सी क्रांति’ पर यकीन करने को विवश होना पड़ा. पहाड़ में तमाम निराशाओं के बीच महिलाएं हमेशा ही कुछ न कुछ रचनात्मक करती हैं. जब वे खेतों में बीज डालती हैं तब किसी गाँव के बसे रहने की संभावना बची रहती है. जब बीज में अंकुर फूंटते हैं तो मुरझाये चेहरे खिल उठते हैं. लेकिन फसल को अंजाम देने के बाद भी वे उसका वाजिब दाम नहीं पा पातीं. पितृसत्ता तो है ही, लेकिन उससे बड़ी सत्ता है बाजार की सत्ता.

रचनात्मक महिला मंच की महिलाओं को अब लगता है कि वे अपनी उगायी चीजों के वाजिब दाम हासिल करने के उपाय करेंगी. और जो शुरूआती कदम उन्होंने आगे बढ़ाये हैं वह हौंसला बढ़ाने वाले हैं. पौड़ी और अल्मोड़ा जनपद का साझा क्षेत्र दोसान (यानी मरचुला से मानिला तक का क्षेत्र) कई पीढ़ियों से मिर्च, हल्दी और अदरक बेचने का काम करता रहा है. पहले क्षेत्र के लोग पैदल मार्गों से अपने ये उत्पाद रामनगर मंडी लाते थे. जहाँ से वे बदले में नमक, गुड़, तेल आदि सामान वापिसी में ले जाते. बाद में मरचुला तक सड़क आ गयी तो यहाँ यह अदला-बदली होने लगी. करीब 40 बरस पूर्व मरचुला से भिकियासैण तक सड़क बनी तो व्यापारियों के एजेंट इन स्थानों तक खुद की पहुँचने लगे. मरचुला से मानिला के बीच की रामगंगा घाटी में अब भी 70 प्रतिशत गाँव सड़क से नहीं जुड़ सके हैं. इस वजह से अधिकतर लोगों को अपने उत्पाद घोड़ों या खुद बोककर सड़क तक लाने पड़ते हैं. लेकिन रामनगर मंडी से आगे जाने वाले माल और गाँवों से मंडी तक आने वाले माल की कीमत में जमीन आसमान का अंतर है.

स्थानीय किसान अपने उत्पाद कम दामों में बेचने को अभिशप्त हैं. लालाओं के कारिंदे फसल तैयार होते ही गाँवों में घूमने लगते हैं और किसानों को बयाना दे जाते हैं. किसान अटक-बिटक कुछ उधार भी इन लोगों से ले लेते हैं. जैसे कॉलेज पढ़ने वाले बच्चों की फीस, बेटी का ब्याह या कई बार दवा-दारू के लिए भी. इस तरह वे कारिंदों से बंध जाते हैं और जिंदगी भर ये कर्ज साथ नहीं छोड़ता. रामगंगा आस-पास के गुजरने के बावजूद 75 फीसद भूमि असिंचित या बंजर है. इन गाँवों से 80 फीसद पुरुष काम की तलाश में बाहर चले जाते हैं और गाँव में सिर्फ हल चलाने आते हैं. मौजूदा समय में यहाँ तीस परिवारों पर एक जोड़ी बैल हैं, जो बताता है कि यहाँ के किसान बिना हल लगी खेती ही अधिक करते हैं. यह पुरुषों के घरों से बाहर होने का भी एक लक्षण हो सकता है. 10 फीसद परिवार ऐसे हैं जो परिवार समेत यानी पूर्ण रूप से पलायन कर चुके हैं. गेहूं और धान पहले से ही कम होती थी, अब लगभग नहीं होती. लेकिन, जो होता है उसका बाजार भाव है. उसकी लगातार मांग रहती है. और यह यहाँ के लोगों की गुजर-बसर में योगदान करती है. हल्दी, मिर्च और अदरक जैसी फसलों को जंगली सूंवर, शाही या बन्दर भी नुकसान नहीं पहुंचाते.

यहाँ की हल्दी, मिर्च और अदरक की खासियत ये है कि ये बिना पानी के होती हैं. इनके लिए वर्षाजल ही पर्याप्त है. अतिरिक्त पानी देने पर ये खराब हो जाती हैं. विवेकानंद कृषि अनुसंधान संस्थान अल्मोड़ा के मुताबिक सल्ट क्षेत्र की देसी हल्दी सर्वाधिक एंटी-सेप्टिक गुणों वाली है. इसे दूध के साथ पीने पर सर्वाधिक लाभ मिलता है. स्थानीय हल्दी के जानकर बताते हैं कि रामनगर के लाला इसे सामान्य हल्दी की तरह न बेचकर औषधि उद्योगों को इसकी सप्लाई करते हैं. जिससे उन्हें इसके और भी ऊंचे दाम मिल जाते हैं. हाल ही में बाबा रामदेव ने भी ऐसी हल्दी उत्पादक क्षेत्रों से हल्दी खरीदकर उसे ‘दैवीय हल्दी’ नाम से बेचना शुरू किया है. अच्छी बात ये भी है कि स्थानीय किसानों के पास अब भी औसतन 35-40 नाली भूमि है. और गाँवों में रह रही महिलाएं अपने पुश्तैनी पेशे को आगे बढ़ा रही हैं.

हल चलाने के सिवा कृषि पूरी तरह से उन पर निर्भर है. वे हल चलाना शुरू कर दें तो यहाँ की अर्थव्यवस्था को महिला-आधारित-कृषि कहा जा सकेगा. पहले पीपल्स साइंस इंस्टिट्यूट देहरादून में काम करने वाले डॉ. अजय जोशी और फोर्ड फाउंडेशन की स्कालरशिप से नीदरलैंड से पढ़ाई कर लौटे सल्ट के ही शंकर दत्त बर्थवाल ने करीब दो साल पहले श्रमयोग नाम की एक संस्था गठित कर यहाँ की अर्थव्यवस्था को समझने और उसमें हस्तक्षेप का बीड़ा उठाया. डॉ. अजय जोशी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर पिछले करीब एक दशक से देश भर के गाँवों में घूमते रहे हैं और शंकर ने एनवायरर्न्मेंटल इकॉनोमी की पढ़ाई की है. डॉ. जोशी के मुताबिक हम सल्ट में इसी बात को देखना चाहते थे कि क्या यहाँ की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर हो सकती है? क्यूंकि पीढ़ियों से यहाँ के लोग विपणन करते आये हैं, उनके पास कृषि से आय अर्जित करने का लंबा अनुभव है.

हमें यह जानकर खुशी हुई कि यहाँ की मिर्च, अदरक, हल्दी की बाजार में भारी मांग है. मौजूदा उत्पादन से कहीं अधिक. उसकी गुणवत्ता भी अच्छी है. लेकिन लगातार कृषि करने और बाजार से जुड़े होने के बावजूद उनकी जीवन-गुणवत्ता नहीं सुधर रही है. इसके लिए विपणन का मौजूदा ढांचा जिम्मेदार है. इस ढांचे में दाम तय करने वाला व्यक्ति रामनगर के लाला का एजेंट है. जोशी बताते हैं कि हमने सल्ट के गीन्ग्ड़े, काने, खल्पाटी, मटवास, थला, मौडाली और जसपुर में महिलाओं के समूह (सेल्फ हेल्प ग्रुप) बनाकर उनके खाते खुलवाए. अब यहाँ दो और समूह बन गए हैं. महिलाओं ने पहले साल जो उत्पाद हमें बेचा उससे उन्हें करीब 10 हजार की बचत हुई, जो दूसरे साल करीब 40 हजार की हो गयी. बचत के इन खातों में प्रति महिला 25 रुपये जमा करती हैं. हमारा अनुमान है कि इस वर्ष (मौजूदा फसल के लिए) यह बचत 60 हजार का आंकड़ा पार कर जाएगी.


इस रकम को महिलाएं सुख-दुःख में इस्तेमाल कर सकती हैं. यह बची हुई रकम केवल उत्पादों की उस मात्रा को बेचने के बाद की है जो हमने उनसे खरीदा. जो कि बहुत सीमित है. इसी तरह के दो और प्रयोग हमने गैरसैंण के पास बछुवाबान और दिल्ली के जय विहार (नजफगढ़) में किये हैं. बछुवाबान में महिलाओं के छह समूह बने हैं, जिनमें से दो के खाते खुल चुके हैं. और जय विहार में पांच समूह बने हैं, जिनमें से एक के पास खाता है. सल्ट व गैरसैंण और दूसरी तरफ दिल्ली का जय विहार दरअसल वो त्रिभुज है जहाँ हम एक अर्थव्यवस्था की संभावना तलाश रहे हैं.

गैरसैंण का आस-पास का क्षेत्र पर्वतीय वजूद का प्रतिनिधि है, जबकि जय विहार वह जगह है जहाँ इस क्षेत्र के अधिकांश लोग पलायन कर बसे हैं. हम गाँव की शुद्ध हल्दी, मिर्च, लहसुन, अदरक, मंडुवा आदि उन तक पहुंचाते हैं, जो उन्हें बाजार की कीमत से सस्ता पड़ता है. दूसरी तरफ गाँव की महिलाओं को बाजार भाव से अच्छे दाम मिल जाते हैं. दोनों को पड़त होने की एक ही वजह है- बीच का दलाल वर्ग और उसका बड़ा मार्जिन घटना. यह मार्जिन जितना घटेगा उतना ऐसे उत्पादक क्षेत्रों में कृषि के बचे रहने, बीजों के बचे रहने और उसके इर्द-गिर्द जीवन के दूसरे व्यापार जैसे लोकगीत बचे रहने की गुंजाइश उतनी बड़ जाएगी. शंकर बताते हैं कि पहले चरण में हमने यह काम प्रयोग के तौर पर किया.

अभी हम केवल अपने नेटवर्किंग के परिवारों (देहरादून और दिल्ली) में ही सीमित हैं. लेकिन इसकी अपार संभावना हमें दिखाई देती हैं. अगले चरण में हम इस काम को सांस्थानिक या संगठित रूप देना चाहते हैं. देहरादून, दिल्ली और हल्द्वानी जैसे स्थानों में ऐसा बड़ा समूह है जो गाँव के शुद्ध उत्पादों का तलबगार है. हमारी कोशिश रहेगी कि हम ऐसी पॉकेट्स को एक्टिव करें. हमारा अनुमान है कि प्रति आठ गांवों में मार्केटिंग का काम करने के लिए एक युवक को रोजगार मिल सकता है, जो 10-12 हजार प्रति माह आय अर्जित कर सकेगा.

अगर हमारा काम सस्टेन कर पाया तो सल्ट और गैरसैंण के करीब 50 युवा यह काम कर रहे होंगे. जोशी बताते हैं, महिलाओं की संगठित आर्थिक गतिविधि से जो सामाजिक समूह रचनात्मक महिला मंच बना है, वह अब समग्र में सोचता है. यहाँ तक भी महिलाएं कहने लगी हैं कि पी.डी.एस. के राशन में मंडुवा शामिल होना चाहिए. और स्थानीय स्कूलों के बच्चों के लिए यही खरीदना चाहिए. बच्चे मोटा अनाज खायेंगे तो अधिक तंदुरुस्त होंगे.

जोशी कहते हैं कि रचनात्मक महिला मंच की तात्कालिक सफलता निश्चित ही प्रतीकात्मक है. लेकिन कृषि बचाने, जैव विविधता संजोने और पलायन पर रोक की तमाम संभावनाएं खोलता है. हम हर जगह नहीं पहुँच सकेंगे, लेकिन यह चाहेंगे कि यह विचार पहाड़ में हर जगह पहुंचे. बीजू भाई ने महिलाओं को उनके हौंसले के लिए नमन किया और कहा कि अगर वे अपने बनाये पथ पर आगे बढ़ती रहीं तो पहाड़ की कई विडम्बनाओं को सुलझाने का काम करेंगीं. उन्होंने कहा कि दो ही रास्ते हैं एक हम सरकार को सद्बुद्धि आने का इंतजार करें, जिसकी संभावना फिलहाल तो दूर-दूर तक नजर नहीं आती. दूसरी, यह कि हम खुद एक सरकार हो जाएँ, जैसा दुनिया के कुछ ग्रामीण समाज अब सोचने लगे हैं.


 बीजू भाई ने कहा कि आत्मनिर्भरता से बहुत सी चीजें तय होने लगती है. हमारा रहन-सहन, हमारी भाषा, हमारे गीत, हमारा भोजन, हमारी संस्कृति. यहाँ तक कि स्थानीय संसाधनों का समुचित प्रयोग और उससे हमारा अपनत्व. आजाद भारत की सरकारों ने हमें सिर्फ आत्मनिर्भर से निर्भर बनाने का काम किया. फिर हम उसके सामने विकास के लिए गिड़गिड़ाने लगे. यह बात आपको समझनी होगी कि मांगने से कोई विकास नहीं आता. विकास खुद अपने भीतर लाना पड़ता है.

डॉ. बृजमोहन शर्मा ने कहा कि शहरों का समाज गाँवों पर निर्भर समाज है. शहर रोटी नहीं उगा सकते. शहर स्वाद नहीं पैदा कर सकते. वह सिर्फ खाते हैं. शहरों की भूख से कमाने की एक होड़ सी मची है. विज्ञापनों से लुभाकर जो चिप्स और चीज नागरिकों को खिलाई जा रही है, उसमें बड़ी मिलावट है. परिणाम यह हुआ है कि भांति-भांति की बीमारियों ने उन्हें जकड़ लिया है. लोग अब ‘शुद्ध’ मसालों, पौष्टिक अनाज के लिए जागरूक हो रहे हैं.

लेकिन उन्हें यह सब उपलब्ध कराने के काम आप ही महिलाएं कर सकती हैं. लेकिन इस बार ध्यान रखना कि आत्मविश्वास और आत्मसम्मान के साथ बेचना है. तो इस बार की पहाड़-यात्रा और बारी की तरह निराशा साथ लेकर जाने वाली नहीं रही.

मुझे और विनोद को यह जानकार बड़ी खुशी हुई कि तमाम हतोत्साहनों के बावजूद सल्ट की महिलाएं मोर्चे पर डिगी हुई हैं और एक उजड़ती हुई कृषि-अर्थव्यवस्था में नए प्राण फूंक रही हैं. निश्चित ही ‘श्रमयोग’ जैसी बिरली संस्थाओं की जिम्मेदारी भी अब और बढ़ जाएगी.

-भास्कर उप्रेती

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Comments

Saurav Shome2014-11-26 09:10 AM
"जब वे खेतों में बीज डालती हैं तब किसी गाँव के बसे रहने की संभावना बची रहती है. जब बीज में अंकुर फूंटते हैं तो मुरझाये चेहरे खिल उठते हैं. लेकिन फसल को अंजाम देने के बाद भी वे उसक

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