• हिलवाणी की ओर से आप सबको नए वर्ष की मंगलकामनाएँ 
  •  
  • हिलवाणी का मोबाइल फ़ोन संस्करण जल्द 
  •  
  • 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने कमर कसी 
  • मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव मोड में, फिर वापसी का दावा 
  • अजय भट्ट बने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष 
  • हिलवाणी को आपकी राय और सहयोग का इंतज़ार 
मुख्य मुद्दा
पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कबहूं न छाड़े खेत!
Posted on: 2015-02-26

प्रस्तुत रिपोर्ट लेखक पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की है. इसे उनके लोकप्रिय ब्लॉग जनपथ से साभार लिया गया है. हम सब जानते हैं या नहीं जानते हैं कि सत्ता की भीषण आपाधापी और निवेश और विकास के नाम पर मुनाफ़े और लूट की भयानक अफ़रातफ़री के इस दौर में एक ख़ामोश आंदोलन देश में उठ खड़ा हुआ है जिसके अगुआ करोड़ों किसान और मज़दूर हैं जिन पर उस भूमि अधिग्रहण क़ानून की दोधारी तलवार लटक रही है जिसे पास कराने को लेकर मौजूदा निजाम ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगाए बैठा है. 


पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कबहूं न छाड़े खेत! ज़मीन हड़प अध्यापदेश के खिलाफ संसद मार्ग पर विशाल रैली, 24 फरवरी 2015 अभिषेक श्रीवास्तपव करीब तीन हफ्ते पहले की बात है जब दिल्लीस की चुनावी सरगर्मी के बीच एक स्टो री के सिलसिले में हम कम्युकनिस्टल पार्टियों के सुनसान दफ्तरों के चक्कoर लगा रहे थे। मतदान से ठीक एक दिन पहले 36, कैनिंग लेन में जाना हुआ जहां मार्क्संवादी कम्युलनिस्टम पार्टी (माकपा) की किसान सभा का दफ्तर है।


सत्तनर बरस पार कर चुके किसान सभा के नेता सुनीत चोपड़ा से वहां मुलाकात तय थी। उनका आशावाद इतना जबरदस्तक था कि कम्युेनिस्ट़ पार्टियों की बदहाली से जुड़ी किसी भी बात पर वे कान देने को तैयार नहीं थे। जब उन्होंतने गिनवाया कि अखिल भारतीय खेत मजदूर यूनियन के देश भर में करीब 56 लाख सदस्य हैं और बीते दो वर्षों में यह संख्यात तेज़ी से बढ़ी है, तो सहज विश्वाास नहीं हुआ। फिर उन्हों ने एक बात कही, ''हम सब मुख्याधारा के परसेप्श न ट्रैप में फंसे हुए हैं।''

लाल झण्डों से पटा हुआ दिल्लीप का संसद मार्ग यह बात कितना सच थी, इसका अहसास 24 फरवरी को लाल झण्डों् से पूरी तरह पटे हुए संसद मार्ग पर हुआ जब चोपड़ा ने हज़ारों किसानों के सैलाब को मंच से गदरी बाबाओं के मुहावरे में ललकारा, ''सुरा सो पहचानिये, जो लड़े दीन के हेत / पुर्जा-पुर्जा कट मरे, कबहूं न छाड़े खेत।'' और इतना कहते ही इंकलाब जिंदाबाद के नारों से लुटियन की दिल्लीक गूंज उठी। यह एक ऐतिहासिक दिन था। ऐतिहासिक इसलिए क्योंरकि मेरे जाने में शायद पहली बार ज़मीन और किसान के मसले पर तमिलनाडु से लेकर कश्मींर तक के तमाम जनांदोलन, भारतीय कम्यु निस्टि पार्टी, माकपा, लिबरेशन सभी एक मंच पर समान अधिकार से मौजूद थे। और उस मंच पर वे अन्नाि हज़ारे भी थे जो लगातार इस बात की रट लगाए थे कि वे राजनीतिक दलों के साथ मंच साझा नहीं करेंगे।

दिलचस्पम यह था कि जंतर-मंतर पर जेडीयू के दफ्तर के सामने जहां अन्नाल का मंच अलग से बना था, वहां दबी जुबान में युवा क्रान्ति नाम का संगठन चलाने वाले राकेश रफ़ीक नाम के एक शख्सम को गालियां पड़ रही थीं कि उसने साजिश कर के अन्नाच को कम्युरनिस्टोंक के साथ बैठा दिया। इससे कहीं ज्यायदा दिलचस्पउ यह था कि ऐसा कहने वाले पुराने कांग्रेसी और संघी दोनों थे जो अन्ना के मंच का अनिवार्य हिस्सा थे। इससे भी कहीं ज्या्दा दिलचस्पथ बात यह थी कि संसद मार्ग के मंच पर भी राकेश रफ़ीक की मौजूदगी को लेकर औरों के मन में कुछ शंकाएं थीं।

सबसे मज़ेदार घटना यह रही कि जनता के स्वोयंभू पत्रकार रवीश कुमार ने एक दिन पहले जिस एकता परिषद और उसके नेता पीवी राजगोपाल पर केंद्रित अपनी रिपोर्ट एनडीटीवी पर दिखायी थी, उसकी ट्रेन से आई जनता संसद मार्ग पर इंतज़ार करती रह गई लेकिन राजगोपाल वहां देर शाम तक नहीं पहुंचे और ट्रैफिक खोल दिया गया। संसद मार्ग का मंच जहां विशाल जनसभा और रैली हुई दिल्लीा में 24 फरवरी 2015 का दिन बहुत नाटकीय रहा। मीडिया में जो दिखाया गया, वह सड़क पर नहीं था। जो सड़क पर था, उसे कैमरे कैद नहीं कर पा रहे थे। इसकी दो वजहें थीं, जैसा मुझे समझ में आया। जैसा कि मीडिया में प्रचारित था कि यह आंदोलन अन्ना का है और जंतर-मंतर से चलाया जा रहा है, उसी हिसाब से दिन में बारह बजे के आसपास जब मैं जंतर-मंतर पहुंचा तो वहां अपने मंच पर अन्नाै मौजूद नहीं थे।

फिल्मी गीत बजाए जा रहे थे और एक बड़ा सा नगाड़ा रह-रह कर पीटा जा रहा था। करीब दो सौ लोग रहे होंगे और चैनलों की सारी ओबी वैन व क्रेन वाले कैमरे वहां मुस्तैकद थे। अन्नाओ के मंच का करीबी पड़ोसी साथ में यमुना शुद्धीकरण अभियान, गौरक्षा अभियान, आयुर्वेदिक दवाओं के परचे आदि अन्ना् के मंच के साथ गुत्थदमगुत्थाड थे। मैंने कई लोगों से पूछा कि अन्नाे कहां हैं। ज्याअदातर लोगों ने यही बताया कि अन्नाध आने वाले हैं। सिर्फ एक पुलिसवाले ने बताया कि अन्नाा तो संसद मार्ग के मंच पर बैठे हैं। चूंकि संसद मार्ग तकरीबन पूरी तरह भरा हुआ था इसलिए क्रेन वाले कैमरे वहां नहीं जा सकते थे।

मजबूरन, रिपोर्टरों को वहां कंधे वाले कैमरे लेकर पहुंचना पड़ा। बावजूद इसके, किसी ने भी यह बताने की ज़हमत नहीं उठाई कि अन्ना का मंच खाली है और अन्ना राजनीतिक दलों के साथ मंच साझा कर रहे हैं, जो कि उनका अपना मंच नहीं है। ये अन्ना के मंच के साझीदार हैं दूसरी वजह गृह मंत्रालय के एक सूत्र से पता चली। उन्होंोने बताया कि चैनलों को साफ तौर पर कहा गया था कि आंदोलन में उन्हींत चेहरों को दिखाना है जो ''निगोशिएबल'' हों। निगोशिएबल का मतलब जिनसे सौदा किया जा सके। आंदोलन के जिन चेहरों को हम टीवी पर देख रहे हैं, उनमें राजगोपाल सबसे ज्या।दा सौदेबाज़ चेहरे के रूप में अपने अतीत की हरकतों से साबित होते रहे हैं। तीन साल पहले यही राजगोपाल कुछ आदिवासियों को लेकर दिल्लीन निकले थे और आगरा में इन्होंीने जयराम रमेश से सौदा कर के उन्हें गले लगा लिया था। इन्हींआ राजगोपाल की पदयात्रा में 12 लोग गर्मी से मारे गए थे जिसकी खबर दि हिंदू के अलावा कहीं नहीं आई थी। ज़ाहिर है, रवीश कुमार ब्रांड की ''रिपोर्टिंग'' में जनवाद की आखिरी हद पीवी राजगोपाल तक ही जा सकती थी।


चूंकि राजगोपाल से बड़ा चेहरा अन्नाा हैं, इसलिए सारे मामले को अन्ना के आंदोलन के नाम से प्रचारित किया गया क्यों कि गृह मंत्रालय के मुताबिक ऐसा करने से आंदोलन की कामयाबी का सारा श्रेय भी अन्ना् को ही जाएगा और इस तरह आंदोलन की रूपरेखा और योजना बनाने वाले सैकड़ों जनांदोलन, जन संगठन व कम्यु निस्टे पार्टिंया सिरे से साफ हो जाएंगी। बहरहाल, संसद मार्ग पर जब मैं पहुंचा तब भाकपा के किसान नेता अतुल कुमार अनजान बोल रहे थे। एक बजे के आसपास आसानी से कहा जा सकता है कि संसद मार्ग पर दस हज़ार के आसपास लोग रहे होंगे।

बड़े टीवी चैनलों में सिर्फ एनडीटीवी, न्यूरज़ एक्सो और न्यूयज नेशन के गन माइक दिख रहे थे। अधिकतर अखबारों और एजेंसियों के फोटोग्राफर वहां मौजूद थे। मंच पर तमिलनाडु के फायरब्रांड नेता वाइको की मौजूदगी आश्चंर्यजनक थी जो करीब एक हज़ार समर्थकों के साथ वहां आए थे। उनके अलावा माकपा के हनान मुल्लाट और सुनीत चोपड़ा, लिबरेशन से कविता कृष्णएन, मेधा पाटकर, डॉ. सुनीलम, भूपेंदर सिंह रावत आदि एनएपीएम के नेता वहां थे और मधुरेश व रोमा संचालन कर रहे थे। अन्नाा इन सब के बीच में शांत बैठे थे। युवा क्रान्ति के राकेश रफ़ीक मंच पर सबसे ज्याेदा चहलकदमी कर रहे थे। भाषणों के बीच रह-रह कर खबरें आ रही थीं कि पीवी राजगोपाल पांच हजार किसान नेताओं के साथ पहुंचने वाले हैं। एक खबर यह भी थी कि अरविंद केजरीवाल तीन बजे आएंगे। अन्नार चाहते थे कि वे अरविंद के आने से पहले इस मंच से अपने मंच की ओर चले जाएं लिहाजा उन्हेंस ढाई बजे ही बोलने का मौका दे दिया गया।


इसके बावजूद वे जा नहीं पाए और अरविंद पहुंच ही गए। ऐसे चढ़ाए गए मंच पर अरविंद केजरीवाल अरविंद के पीछे-पीछे योगेंद्र यादव और सोमनाथ भारती भी आए। अरविंद के आने तक कम्युदनिस्ट पार्टियों के अधिकतर नेता मंच से उतर चुके थे। सुनने में आया कि राकेश रफ़ीक मंच को अपने तरीके से मैनेज करने की कोशिश में थे और वे नहीं चाहते थे कि अरविंद मंच पर आएं। यह बात इससे पुष्टर होती है कि जब सारे नेता सीधे मंच पर पहुंच जा रहे थे, अरविंद को मंच के नीचे दरी पर कुछ देर के लिए बैठना पड़ा। उसके बाद भी दो बार वे मंच पर चढ़ने की कोशिश में नाकाम रहे लेकिन फिर ऊपर से उन्हेंा खींच लिया गया। अन्नार से अरविंद ने आंखें नहीं मिलाईं लेकिन वाइको से जमकर गले मिले।

अरविंद जितनी देर बैठे रहे, अन्नान की तरफ़ उन्होंमने नहीं देखा जबकि अन्ना लगातार मूर्ति की तरह सामने देखकर मुस्क राते ही रहे। दूसरी बार दिल्लीह के मुख्यिमंत्री के बतौर किसी प्रदर्शन में पहली बार अरविंद का भाषण हुआ। उन्होंबने बीजेपी सरकार को उद्योगपतियों का प्रॉपर्टी डीलर ठहराया और दिल्लीी चुनाव में दिए सबक की याद दिलाते हुए एक बार खांसे। फिर उन्हों ने कहा कि दिल्ली में ज़मीन का मसला केंद्र की जिम्मेेदारी है, दिल्लीप सरकार की नहीं। ऐसा कह कर वे दो बार खांसे। फिर उन्होंरने कहा कि अगर आप जनता के लिए काम करते हैं तो जनता खुशी-खुशी अपनी ज़मीन आपको देगी लेकिन अगर आपने जनता पर बुलडोज़र चलवाया तो वह आप पर बुलडोज़र चला देगी, जैसा हमने दिल्लीप में देखा। इसके बाद अरविंद चार बार खांसे।

अंत में उन्होंकने अन्नाि को अपना गुरु और पिता समान बताते हुए उनसे अगले दिन सचिवालय में आकर उसे 'शुद्ध' करने का आग्रह किया जिस पर जनता ने तालियां बजाकर जोरदार प्रतिक्रिया दी। फिल्मीि गीतों के बीच ''शुद्ध आचार, शुद्ध विचार'' की घोषणा करता अन्नाग का मंच चूंकि जंतर-मंतर और संसद मार्ग के मंच को बीच में से एक गली जोड़ती है, लिहाजा लोगों का एक मंच से दूसरे तक अहर्निश आना-जाना लगा हुआ था। शाम के साढ़े तीन बज चुके थे और कांग्रेस के एक कार्यकर्ता की मानें तो अन्नाा के उस विशाल मंच पर ''बेवड़े'' विराजमान थे जहां ''शुद्ध आचार, शुद्ध विचार'' का नारा बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था। दरअसल, संसद मार्ग के मंच से मेधा ने खबर दी कि राजगोपाल की रैली को रास्तेक में रोक लिया गया है और अगर पंद्रह मिनट में उन्हेंक नहीं छोड़ा गया तो मंचस्थत सारे नेता उन्हेंअ लेने पैदल ही जाएंगे। फिर शायद सारे नेता मंच से इसी वजह से उतर भी गए।

कुछ देर बाद मेधा फिर आईं और उन्हों्ने बताया कि वे उधर जाने ही वाले थे कि खबर आई है कि उन्हेंद छोड़ दिया गया है। इन दो घोषणाओं के बीच जंतर-मंतर वाले मंच के सामने कांग्रेस सेवा दल और जेडीयू के कुछ कार्यकर्ता एकत्रित होकर मंच पर बोल रहे एक युवक को गाली दे रहे थे। मैंने जानना चाहा तो एक युवक ने बताया, ''अन्नार के मंच पर सारे ग्रेटर नोएडा के बेवड़े बैठे हैं''। थोड़ी देर में फिर से फिल्मीे गीत बजने शुरू हो गए। उधर टक्कीर में संसद मार्ग वाले मंच पर कमान संभाली अरविंद गौड़ की अस्मिता टीम ने, लेकिन वे जितनी तेजी से बिना सुर के चीखते जाते, भीड़ उतनी ही कम होती जाती थी।

साढ़े चार बजे के आसपास यह समझ में आ चुका था कि संसद मार्ग वाली रैली को जबरन अस्मिता के बहाने खींचा जा रहा है जबकि अन्नाथ समेत सारे नेता कहीं गायब हो चुके थे। अन्नार अपने मंच पर भी नहीं थे। दो लड़कों ने अपना पोस्टैर पकड़ा कर इनकी फोटो उतार ली पांच बजे के बाद संसद मार्ग को खोला जाना था। आरएएफ वाले लोगों को हटाने लगे। कई जगह कुछ औरतें और पुरुष गोला बनाकर बैठे थे और वे समझ नहीं पा रहे थे कि कहां जाना है। ये टीकमगढ़ और डिंडोरी से आए लोग थे।

सारे एकता परिषद के थे और उन्हेंह कहा गया था कि उनका नेता राजगोपाल संसद मार्ग पर ही आएगा। ये लोग ट्रेन से दिल्ली आए थे। कुल दो हज़ार के आसपास रहे होंगे। इन्हें निर्देश देने वाला कोई नहीं था। इस बीच दो लड़के इन्हें घेर कर फोटो खींचने में जुटे थे। पता चला कि एकता परिषद की औरतों के हाथ में उन लड़कों ने अन्नाट हज़ारे को समर्थन करता हुआ जेएवाइएस का पोस्ट र जबरन पकड़ा दिया था और वे खुशी-खुशी फोटो खिंचवा रही थीं। एकता परिषद की औरतें और आदमी ट्रैफिक खुलने के कारण इधर-उधर बिखर गए, लेकिन जंतर-मंतर पर उनके नेता राजगोपाल अब तक नहीं पहुंचे थे। मंच से घोषणा हो रही थी कि अन्नापजी राजगोपाल को लेने गए हैं। छह बजे के आसपास कांग्रेस सेवा दल के कुछ पुराने चेहरे और संघ के कुछ परिचित युवा नज़र आए। उन्होंैने बताया कि वे राजगोपाल के साथ पैदल चलकर पलवल से आए हैं।

इनमें कांग्रेस की ''गांव, गांधी, गरीब यात्रा'' के संयोजक विनोद सिंह भी थे। उन्होंआने बताया कि राजगोपाल आ चुके हैं। मंच पर हालांकि कोई नहीं था। बस फिल्मी गीत बज रहे थे। जनांदोलनों का सम्मे।लन, ढिनकिया, ओडिशा, अक्टूीबर 2014 इस दृष्टांन्तो के पीछे की दो बातें पाठकों को बतायी जानी जरूरी हैं। सबसे पहली बात यह कि केंद्र में नई सरकार बनने के बाद जमीन केंद्रित आंदोलन और आंदोलनों व संगठनों की एकता की पहल की बात सबसे पहले ओडिशा के ढिनकिया गांव में अक्टू बर 2014 में हुए दो दिवसीय एक सम्मेतलन में उठायी गई थी जिसका मैं गवाह था। इस सम्मे2लन में देश के डेढ़ सौ से ज्याहदा जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्साव लिया था और ज़मीन के सवाल पर केंद्रित आंदोलनों को एकजुट करने का संकल्पर पारित हुआ था।

यह 24 फरवरी 2015 की पृष्ठ भूमि है। इसके बाद जब जमीन लूटने वाला अध्यािदेश आया, तो जनसंगठनों और कम्युानिस्ट पार्टियों ने मिलकर सिलसिलेवार बैठकें कीं जिसका ठिकाना दिल्लीे का भाकपा मुख्यांलय अजय भवन रहा। यह अपने आप में दिलचस्प बात थी कि जब दिल्ली के चुनाव परिणाम आ रहे थे, तब अजय भवन में जनांदोलन 24 फरवरी के प्रदर्शन की तैयारी कर रहे थे। इसी वजह से ढिनकिया में हुए सम्मेिलन का जो दूसरा संस्क रण झारखण्डर के मधुपुर में 23 से 25 फरवरी के बीच होना था, उसे रद्द किया गया। 60,000 लोगों के साथ आगरा में विश्वा सघात की तस्वीरर, 2012 इस पूरी प्रक्रिया में अचानक तीन लोगों का प्रवेश अन्नाा हज़ारे को पैराशूट से आंदोलन में उतारने का सबब बना।

उनमें एक थे पीवी राजगोपाल (जिन्होंकने आदिवासियों की यात्रा से विश्वा सघात करते हुए तीन साल पहले जयराम रमेश से सौदा कर लिया था), दूसरे थे राकेश रफ़ीक (जो 'युवा भारत' संगठन को तोड़कर 'युवा क्रान्ति' बनाने के लिए कुख्याित हैं) और तीसरे थे अल्पकज्ञात सुनील फौजी, जो ग्रेटर नोएडा के किसान नेता हैं। बताते हैं कि सुनील फौजी के कपिल सिब्बसल से करीबी ताल्लुाकात हैं और यही वजह है कि अन्नाा के मंच पर कांग्रेसियों की अच्छीस-खासी भरमार थी। इन तीन लोगों ने अन्ना हज़ारे को कथित तौर पर आंदोलन में लाने का प्रस्तासव रखा, जिसे मेधा पाटकर के नेतृत्वै ने काफी सतर्कता से बरता और पूरी कोशिश की गई कि किसी भी तरह आंदोलन को ''सैबोटाज'' न होने दिया जा सके। संसद मार्ग के मंच पर अन्ना की खामोश उपस्थिति बाकी सारी कहानी बयां कर देती है। ज़ाहिर है, मीडिया में न तो वाम दलों को आना था, न मेधा पाटकर को और न ही लाल झंडे से पटे संसद मार्ग को। सारी लड़ाई अन्ना बनाम मोदी की बना दी गई है, तो ऐसा सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ है।

अगर किसानों को कुछ राहत मिलती है, तो ज़ाहिर है उसका श्रेय अन्नाि और राजगोपाल ले जाएंगे। अगर नहीं, तो भी चेहरा इन दोनों का ही चमकेगा। कुल मिलाकर देखें तो सुनीत चोपड़ा की कही बात कि ''हम सब मुख्येधारा के परसेप्शान ट्रैप में फंसे हुए हैं'', बिलकुल सच साबित हो रही है। संतोष सिर्फ एक बात का है कि इन तमाम साजिशों को नाकाम करने के लिए आज सड़क पर हज़़ारों किसान उतर चुके हैं जो अपनी ज़मीनें बचाने के लिए ''पुर्जा-पुर्जा कट मरने'' को तैयार हैं।

इन्हें इंतज़ार है 23 मार्च की भगत सिंह शहादत दिवस का, जब एक साथ इस देश के हज़ारों लोग भूमि लूट अध्याादेश के खिलाफ़ शहीद होने का सामूहिक संकल्पल लेंगे। ज़ाहिर है, मीडिया तब भी सौदेबाज़ों को ही दिखाएगा। इसमें पत्रकार से लप्रेककार बने रवीश कुमार की कोई गलती नहीं है। सौदेबाज़ी के दौर में प्रेम कथा हो चाहे आंदोलन कथा, वह लघु होने को ही अभिशप्तस है।

इस रिपोर्ट के लिए हिलवाणी अभिषेक श्रीवास्तव और उनके ब्लॉग जनपथ का आभारी है.
लिंक ये रहाः http://www.junputh.com/2015/02/blog-post_25.html

Click to print the article.

Comments


Post Your Comments




Follow us on:


हिलवाणी से जुड़ें

हिलवाणी, उत्तराखंड और पहाड़ों को देखने, जानने और समझने का सीधा और सरल ज़रिया. हिलवाणी आपकी वेबसाइट है. हिलवाणी से आप भी जुड़ें. अगर आपके पास है कोई दिलचस्प समाचार,विचार या फ़ोटो तो हमें भेजें. ईमेल करें shiv@hillwani.com या shalinidun@gmail.com पर.

हिलवाणी के लिए

Very nice site. Font color should be more dark so that reading become easy. Rest is best.
Email: learnatmegatech@gmail.com
- Ajay Saxena , Dehradun, Management and Engineering Teacher

Very nice site. Font color should be more dark so that reading become easy. Rest is best.
Email: learnatmegatech@gmail.com
- Ajay Saxena , Dehradun, Management and Engineering Teacher

Fabulous site. Itís informative, thought provoking and motivating, all at the same time.
- Kishore Pandit, Dehradun

आप लोग इस साईट को लगातार सुधार रहे हैं, यह एक सुखद संकेत है. इस साईट पर आकर एक सुखद अहसास होता है. साईट को और लोकप्रिय बनाने के लिए कुछ और तेजी और आक्रामकता लाइए.
- गोविंद सिंह, हल्द्वानी

HILLWANI IS BRAND E MAGAZINE OF HILLS NOW. IT IS SURPRISING THAT U R RUNNING IT SINCE A LONG TIME WITHOUT ADVERTISEMENTS. WELL DONE.
- mukesh nautiyal, dehradun

शालिनीजी, हिलवाणी वेबसाइट बहुत अच्छी लगी. काफी मेहनत से आप लोग अपडेट रखते हैं. आप और आपके साथियों को बधाई.
- हारिस शेख, मुंबई

Hillwani seems to be a great effort towards establishing a local cybersite for the uttarakhandis. Keep it up and please keep it updating.
- पीसी जोशी, नई दिल्ली

gone through the hillwani site. Enjoyed watching photos and reading reports. Doing great job.
- हर्षवंती बिष्ट, उत्तरकाशी

एक पहाड़ी इ-पत्रिका के रूप में हिलवाणी का आना अच्छा लगा
- हेमचंद्र बहुगुणा, दिल्ली

हिलवाणी पहाड़ के सरोकारों, उम्मीदों और लक्ष्यों को सार्थक तरीके से सामने लाने की एक पेशेवर कोशिश बनी रहे, ऐसी कामना है
- रामदत्त त्रिपाठी, लखनऊ

i visted hillwani recently and find it very interesting and full of knowledge not only about news and views on my Motherland Uttarakhand but also about the major issues and problems of this Himalayan state.
- गीतेश नेगी, सिंगापुर

hillwani as VIBGYOR on mountains
- भास्कर उप्रेती, देहरादून

हिलवाणी के लिये बधाई.पहाड़ के लोगों को अपनी धरती से प्यार है.मुझे इससे काफी आशाएं हैं.
- शुभ्रांशु चौधरी,छ्त्तीसगढ़

हिलवाणी अच्छा है। इसे विकसित किया जाए तो बड़े काम का साइट हो जाएगा। थोड़ा फोटो फीचर बढ़ा दें। एक फोटो दस्तावेज़ हो सकता है। स्थानीय बोली की रचनाएं अच्छी लगती हैं।
- रवीश कुमार, दिल्ली

kamal ki site banayi hai...aisai manch ki sakht zaroorat thi...aur mitravar, aapkai saksham hathon mai hai isliye ummeedain bhi bandh rahi hain...jan,jangal, zameen kai sawal apsai badhiya kaun utha sakta hai... ...dhanonmukh patrakarita kai is yug mai janonmukh upkram ka parcham lahraya hai aapnai, aap samman ke bhagi hain, abhinandan kai patra hain.... ..pahad ke logon ki janvadi akankshaon ka gunjayman manch bane ye site,yahi kamna hai...badhai..
- प्रभात डबराल, दिल्ली

हिलवाणी एक सजग और सुरूचिपूर्ण कोशिश है.
- शैलेश कुमार, बंगलौर

उत्तराखंड पर ढेरों साइट्स हैं, लेकिन सभी आधी-अधूरी। आपकी साइट इस गैप को भरती दिखती है। उम्मीद है आप पहाड़ की उन खबरों को भी तरजीह देंगे, जो आमतौर पर अखबारों से गायब दिखती हैं। साइट में ऑडियो फंक्शन जोरदार लगा।
- राकेश परमार, देहरादून

हिलवाणी एक बहुत ज्ञानवर्धक वेबसाइट है। यहाँ हमें उत्तराखंड से जुडी हुयी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। आपका प्रयास स्तुत्य है। बस एक सुझाव देना चाहता हूँ कि यहाँ आप कुछ आलेख गढ़वाली भाषा में भी डालें क्योंकि हमारी भाषा हमारी पहचान है। पहाड़ों कि संस्कृति बचानी है तो सबसे पहले हमारी भाषा को बचाना होगा। गुणानंद पथिक जी कि गढ़वाली कविता पढ़कर अच्छा लगा।
- साकेत बहुगुणा

good work. keep it up!
- अल्मा डबराल, दिल्ली

ये सराहनीय और सार्थक प्रयास है. गढ़वाल के रीति रिवाज व संस्कृति को और ज़्यादा प्रस्तुत करने की कोशिश हो तो बेहतर रहेगा.
- दर्शन सिंह रावत, देहरादून

हिलवाणी को देखकर सुखद अहसास हुआ. अच्छा लगा कि ये काम शुरू हो पाया है.
- जगमोहन आज़ाद, नोएडा

Its good to see all our garhawal news are popping up here. It drives us towards our unforgettable memories. keep on putting your efforts so we can be updated same about our native irrespective of the part of world we are living.
- अविनाश नौटियाल

हिलवाणी के लिए हौसला बनाए रखना और स्तर बनाए रखना.
- लोकेश नवानी, देहरादून

It is a very nice portal. I could find all recent news about uttarakhand on it. And the articles were also good. Specially the "Yuva corner"
- सौरभ गर्ग, नई दिल्ली

The site appears awesome.
- लोकेश ओहरी, हाइडेलबर्ग

काव्यात्मक और कलात्मकता की संजीदगी लिए हिलवाणी पहाड़ की ज़श्न-ए-आज़ादी जैसा हो. शुभकामनाएं.
- प्रमोद कौंसवाल, दिल्ली

Hillwani is a very refreshing wbsite with all the ingredients that a good website must have. I came to know about it from one of my friends, and I'm happy to discover such a nice wesite. Keep up the good work.
- रवि शेखर, रांची

हिलवाणी को विस्तार से देखा. बहुत ख़ूबसूरत है. पहाड़ में हरियाली बहुत सुहाती है. दिन रात मारधाड़ या भाषण की ख़बरों से अलग इस तरह की चीज़ वाक़ई बहुत अच्छी लगी.
- मोहम्मद समी अहमद, मुज़फ़्फ़रपुर

साइट देखी. बढ़िया है. सुधार की गुंजाइश तो लगातार बनी रहती है. मुझे लगता है कि धीरे-दीरे कंटेंट बढ़ने पर और बेहतर होगी.
- प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता

वेबसाइट अच्छी है. थोड़ी कलरफ़ुल कर दीजिए. अभी सादी लग रही है. बाक़ी शुरुआत अच्छी है.
- आभा मोंढें, बॉन

बहुत अच्छी है ये कोशिश. अच्छी लगी. दो पंक्तियों में चलता स्क्रोलर थोड़ा डिस्ट्रैक्ट कर रहा है. एक से ही काम चल सकता है.
- तस्लीम ख़ान, नई दिल्ली

हिलवाणी हमेशा गूंजती रहे. शुभकामनाएं.
- नवीन जोशी, नैनीताल

बहुत ही अच्‍छा प्रयास है सार्थक बनाये रखे.
- विमलेश गुप्‍ता, शाहजहांपुर

A timely, novel and positive effort indeed. Keep it up!
- सी के चंद्रमोहन, देहरादून

एक गंभीर प्रयास
- सचिन गौड़, बॉन

हिलवाणी के प्रयोग के लिए बधाई.
- ज़हूर आलम, नैनीताल

हिलवाणी के लिए बधाई और शुभकामनाएं
- वीरेन डंगवाल, बरेली

'हिलवाणी' बहुत अच्छी लगी - एक सुखद आश्चर्य जैसी. एक नज़र सभी पृष्ठ देख गया हूं. समाचार, कथा-कहानियां, कविताएं, साक्षात्कार, सभी कुछ तो है. बहुत सुंदर शुरुआत है.
- गुलशन मधुर, वाशिंगटन

ये वाकई बहुत अच्छी शुरुआत है. कम से कम मुझे अब ये पता चल पाया कि गुणानंद पथिक कौन थे. इसे लॉंच करने का शुक्रिया.
- दीपक डोभाल, वाशिंगटन

गिर्दा और विद्यासागर जी की आवाज़ सुनना ख़ास तौर से अच्छा लगा. मुझे विश्वास है हिलवाणी को पहाड़ की नई पुरानी पीढ़ियो का सक्रिय सहयोग और समर्थन मिलेगा.
- मंगलेश डबराल, दिल्ली

कंसेप्ट और कंटेंट बहुत अच्छा है. इन्हें बनाए रखें.
- रामदत्त त्रिपाठी, लखनऊ

वेबसाइट देखकर बहुत अच्छा लगा
- गोविंद सिंह, नई दिल्ली

वेबसाइट पसंद आई
- ललित मोहन जोशी, लंदन

अच्छी पहल, बधाई
- प्रोफ़ेसर गिरजेश पंत, देहरादून

बहुत बढ़िया शुरुआत. आला दर्जे की विविधता भरी सामग्री. बनाए रखें
- आनंद शर्मा, देहरादून

Join Us

Hillwani is an easy way to know and reach Uttarakhand and the Hills.
Hillwani is your website
Join Hillwani
If you have any news,views or photos you find interesting.
Do send us at-
shiv@hillwani.com
joshishiv9@gmail.com