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कथा कविता
असद ज़ैदी का कवि कर्म
Posted on: 2010-06-09


जीवित रहे सुबह जो हम सबकी ख़ुशी है

असद ज़ैदी की कविता सांप्रदायिक नव उभार और उसके ख़िलाफ़ संघर्ष की आवाज़ों का एक कोलाज-यथार्थ

आज अमेरिका और यूरोप की साधारण जनता के लिए इस्लाम एक ख़ास तरह की अरूचि वाली ख़बर है. मीडिया, सरकार, भू राजनैतिक रणनीतिकार और इस्लाम के तमाम अकादमिक विशेषज्ञ- जो यूं इस संस्कृति के हाशिये पर हैं- ये सब एक सुर में कहते हैं : इस्लाम पश्चिमी सभ्यता के लिए ख़तरा है.....मेरा कहना है कि इस्लाम की नकारात्मक छवियां अन्य छवियों की अपेक्षा यहां ज़्यादा पायी जाती हैं और इन छवियों का तालमेल इस बात से नहीं है कि इस्लाम क्या है बल्कि इस बात से है कि किसी ख़ास समाज के दबदबे वाले वर्ग उसे क्या मानते हैं. इन वर्गो के पास इस्लाम की उस ख़ास तस्वीर को प्रचारित करने की ताक़त भी है और इच्छा भी.

एडवर्ड सईद की किताब ‘कवरिंग इस्लाम’ के अध्याय ‘नॉलेज एंड पावर’ से        

 

गणराज्य के सारे बदमाश संस्मरण सुनाने को बेताब हैं आजकल
भयानक सचाई के अप्रकाशित हिस्से को वे
प्रकाश में लाना चाहते हैं
उनकी कोई दिलचस्पी फ़रेब और पर्दादारी में नहीं रही
-यह काम तो अदालतों और आयोगों में करने का है-
इस वक़्त वे महज़ अपने गुनाहों का इक़बाल करना चाहते हैं
कोई भय उन्हें रोक नहीं सकता कि वे
अब ख़ुद ही हैं साक्षात भय

पहल 89 में प्रकाशित असद ज़ैदी की कविता ‘शानदार लोग’ का अंश.

A three-month long investigation by TEHELKA — carried out all over the country — reveals that a large majority of these cases are redolent of a chilling and systematic witch-hunt against innocent Muslims. Sadly, the expose shows it is not just the policing and intelligence agencies that are to blame — even the judicial process is often complicit in the terrible miscarriage of justice.
अंग्रेज़ी पत्रिका तहलका के चीफ तरूण तेजपाल की टिप्पणी ‘द थिन रेड लाइन’ से.

 

ज़ाहिर है आम लोग युद्ध नहीं चाहते.ये समझा जा सकता है. लेकिन आख़िरकार ये देश के नेता ही होतें हैं जो नीतियां तय करते हैं. और लोगों को युद्ध में घसीट लेना हमेशा ही एक साधारण सी बात है. फिर वो लोकतंत्र हो, या फ़ाशिस्ट तानाशाही या संसद या कम्युनिस्ट तानाशाही. उनकी आवाज़ रहे या जाए, लोगों को हमेशा नेताओं के आगे झुकाया जा सकता है. ये आसान है. आपको करना सिर्फ ये है कि उन्हें बता दें कि उन पर हमला किया जा रहा है और शांति चाहने वालों की कड़ी आलोचना कर दें कि उनमें देशभक्ति का अभाव है और वे देश को ख़तरे में डाल रहे हैं. ये बात प्रत्येक देश पर लागू होती है.
जर्मनी की नात्सी पार्टी के नेता हरमैन वैल्हम गोएरिंग के विचार(अजीत साही की तहलका रिपोर्ट में उद्धृत.)

 

भारत देश में हिंदुओं की संख्या है क़रीब 84-85 करोड़ और मुस्लिम आबादी क़रीब 16 करोड़ है.
एक तथ्यपरक सूचना

******

 

1.

 

यह कैसा समय है कि एक कविता संग्रह की आलोचना या समीक्षा जैसा कुछ करते हुए इतने सारे साहित्येतर संदर्भ लाने पड़ रहे हों. कवि के रचना कर्म पर टिप्पणी करते हुए उसे कैसा रूप दिया जाए. क्या पैटर्न उसका रहेगा. क्या विशुद्ध रूप से साहित्य के हवाले से ही एक समीक्षात्मक टिप्पणी जाए. बिल्कुल सीधी स्पष्ट जोखिम रहित. या इस कवि कर्म को समाज और राजनीति की विभिन्न हलचलों और बैचेनियों के बरक्स परखा जाए. सीधे शब्दों में कविता की बात में क्या पत्रकारिता राजनीति इतिहास और कूटनीति और विमर्श की बातें भी लाएं या रहने दें. लेकिन लगता है कि यह ऐसा ही समय है जब इसकी ज़रूरत बुलंद हो गयी है. सो कहना चाहिए कि ये कविताओं की समीक्षा नहीं है. असद ज़ैदी की कविताएं क्योंकि एक समाज औऱ विचार की गिरावट बताने वाली कविताएं हैं लिहाज़ा इस समाज में इधर के अवमूल्यन की चर्चा उनकी कविता की मदद से इस लेख में की जा रही है. एक कविता की परख से पहले एक समाज की परख का ये समय है. एक कविता की मदद से अगर ऐसा कर पाना किंचित भी मुमकिन है तो क्यों नहीं. हम सब एक सामान की तलाश कर रहे हैं. ये हम सब की चुनौती है. आने वाले समय की डरावनी छायाएं मंडरा रही हैं और मौजूदा समय उनका आईना सा हो गया है.          

एक ज़बर्दस्त अध्ययन, एक हलचली आवेग और निरंतर पठनीयता और देश समाज के गठन की बारीकियों जटिलताओं को समझने की अदम्य चाहत और शायद सबसे अहम एक अफ़सोस- जिसमें असद ज़ैदी के प्रिय ग्राम्शी का बौद्धिक नैराश्य(अपने संवेदनात्मक आशावाद के साथ) भी है और उनका अपना भुगता यथार्थ भी शामिल है. एक ऐसा अफ़सोस जो आर्यो के भारत में प्रवेश और कई नदी घाटी सभ्यताओं और ध्वंस की कई शताब्दियों कई युद्धों, कई नीचताओं क्रूरताओं और अंध धार्मिकताओं के गुबार उड़ाते इतिहास के सामने फैला एक विशाल पर्दा है. असद की कविता इस विश्वव्यापी अफ़सोस का विराट पर्दा है. इसे किंचिद भर उठा देने से इसीलिए हम सबकी रूह का तड़प जाना लाज़िमी है.   

वो चीज़ जिसे जानकर मैं
दूर से देखना चाहता था
दरअसल एक खटका था
भविष्य से वर्तमान की तरफ़ आता हुआ.

यही वो खटका है जिसकी पहचान कर लेना और उसे हम सब के सामने रख देने का हौसला असद की कविता में सुनायी पड़ता है. इस खटके पर हिंदी में कुछ महत्वपूर्ण कविताएं हैं. अपने अपने ढंग की. मुक्तिबोध रघुबीर सहाय विष्णु खरे चंद्रकांत देवताले मंगलेश डबराल सबके पास इस खटके की बेचैन विकल करुण ध्वनियां हैं. लेकिन देखने वाली बात ये है कि कुछ अपने पूर्ववर्ती और कुछ अपने समकालीन इन कवियों की परंपरा में- और सजग अग्रगामी के तौर पर- असद की कविता में ये ध्वनियां, ये चिन्ह ये मिसालें ये खटके ये चोटें ये घाव ज़्यादा पुरअसर तरीक़े से दस्तक देते हैं. क्या ये मानने में हमें हिचक होनी चाहिए कि हिंदी की चुनिंदा साहसी और विलक्षण कविताओं में एक है- इस्लामाबाद.

मौसम खुशनुमा था धूप में
तेज़ी न थी हवा धीरे धीरे
चलती थी, पैदल चलता आदमी
चलता चला जा सकता था कई मील
बड़े मज़े से

यह भी एक खुशफ़हमी थी हालांकि

मेरे साथ चलते शुक्ल जी से जब रहा न गया
तो बोले :

मेरे विचार से तो अब हमें इस्लामाबाद पर
परमाणु बम गिरा ही देना चाहिए.

इस कविता को पढ़कर पहले ठठाकर हंसने की तबीयत करती हैं. फिर आप अचानक ख़ामोश हो जाते हैं और फिर बगले झांकने लगते हैं. इतना कम बोलती हुई कविता औऱ कैसा झनाके वाला अनुभव पैदा करती. कविता के शुक्ल जी अचानक हमें अपने ही बीच में कहीं दिख पड़ते हैं. और ज़्यादा दूर न जाएं हो सकता है वो हमारे भीतर ही कहीं चहलकदमी कर रहे हों. इस्लामाबाद पर बम गिराने की शुक्ल जी की हार्दिक इच्छा इधर कितनी तीव्र और व्यापक होती जा रही है नोट करना चाहिए. और ध्यान रहे ये कोई ऐसा वैसा बम नहीं ये परमाणु बम है. जैसे कि इस ‘पालतु’ बम से सिर्फ इस्लामाबाद को ही जाना है बाकी हमारा अमनो-चैन तो बदस्तूर रहना है.

और सच पूछिए तो शुक्ल जी की इच्छा के एक कोने में एक कौम को ही मिटाने की लालसा है. यह कविता इसलिए भी बड़ी और महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि ये मनुष्यता की बेशर्म गिरावट को दिखाती है. इस लिहाज़ से शुक्ल जी की जो विश है उसे बुश ने एक तरह से इराक़ और अफ़गानिस्तान में पूरा कर दिखाया है. उन्हें कोई न कोई दिख ही जाता है निशाने पर रखे रहने के लिए. और इन्हीं बुश महोदय से एटमी डील साइन कराने की हड़बड़ी में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह बैठते हैं कि श्रीमान राष्ट्रपति महोदय को भारत की जनता बहुत चाहती है. ये बयान कुछ कुछ उसी तरह न हंसने देता न रोने, जैसा शुक्ल जी के बयान को सुनकर पढ़कर लगता है. असद ज़ैदी से क्षमा सहित कुछ इस तरह कि ‘मौसम ख़ुशनुमा था धूप में तेज़ी न थी हवा धीरे धीरे चलती थी, पैदल चलता आदमी चलता चला जा सकता था कई मील बड़े मज़े से, यह भी एक खुशफ़हमी थी हालांकि, बुश के साथ चलते मनमोहन जी से जब रहा न गया तो बोले : मेरे ख़्याल से तो भारत की जनता आपसे बेपनाह मोहब्बत करती है श्रीमानजी.’

 

2.

वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी ने कितना सही और सही वक्तों में कहा है कि 1857 की लड़ाइयां जो बहुत दूर की लड़ाईयां थीं आज बहुत पास की लड़ाइयां है.  कवि का अकेलापन नाम से हाल में प्रकाशित अपनी गद्य पुस्तक में वरिष्ठ कवि मंगलेश डबराल ने इस तीव्र होते जाते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर टिप्पणी करते हुए एक जगह लिखा है- बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद भारतीय समाज के व्यवहारों में कैसा और क्या बदलाव और आया, सामाजिक मानसिकता में कितनी विकृति, किस विचलन, कितनी हिंसा का प्रवेश हुआ?  और जब गुजरात का गला घोंटा गया, जब गर्भवती औरतों से बलात्कार हुए तो इस देश के जन्मसिद्ध नागरिक मुसलमानों की मनोचेतना में किस तरह के परिवर्तन आए ? इस सबका कोई मनो-सामाजिक अध्ययन करने की कोशिश किसी ने नहीं की, हालांकि इस देश में बड़े-बड़े मनोशास्त्रियों के होने की बात कही जाती है, लेकिन शायद यह उनका व्यापार है, प्रतिबद्धता नहीं. तब भी ऐसे ठोस अध्ययनों की सख़्त ज़रूरत है. ज़ाहिर है ऐसे अध्ययन करने वाले और इस बीमारी के लक्षणों का ब्यौरा देने वाले विशेषज्ञ ख़ामोश हैं. जैसा असद ज़ैदी अपनी एक कविता में दम साधे और ख़ामोश किसी इंतज़ार में पड़ी हर शै का ज़िक्र करते हैं.   
मंगलेश डबराल ने मनो-सामाजिक अध्ययन की बात कही है. इस अध्ययन में विशेषज्ञ के तौर पर मीडिया से जुड़े लोग भी आते हैं. लेकिन मीडिया के विशेषज्ञ क्या कर रहे हैं. क्या मीडिया में पूर्वाग्रही आकलन की बाढ़ नहीं आयी हुई है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसे महसूस किया जाता रहा है. विशेषज्ञता में आ रहे इन बदलावों, कमज़ोरियों और मेहनत के अभाव पर ही ऊगुंली रखते हुए प्रख्यात चिंतक लेखक फ़िलॉसफ़र और तुलनात्मक साहित्य के पुरोधा प्रोफेसर एडवर्ड डब्लू सईद ने 1981 में (पुनर्प्रकाशित 1997) एक किताब लिखी थीं. कवरिंग इस्लाम. इसमें दिखाया गया है कि मीडिया और विशेषज्ञ ये कैसे तय करते हैं कि हम शेष दुनिया को कैसे देंखें समझें. सईद अपना एक  अनुभव पाठकों से बांटते हुए बताते हैं कि अस्सी और नब्बे के दशकों से कई वजहों से पश्चिम और अमेरिका में मीडिया का माहौल इस्लाम के ख़िलाफ़ इतना तपा हुआ रहता आया है कि कहीं भी कोई वारदात हो तो सीधे मान लिया जाता कि इसके पीछे ‘इस्लामी’ आतंकी हैं. इसकी एक मिसाल बना अप्रैल 1995 में हुआ ओखलाहोमा सिटी बम विस्फोट. हमले के पीछे आननफानन मान लिया गया कि मुस्लिमों ने एक बार फ़िर हमला कर दिया है. सईद बताते हैं कि उन्हें याद है कि कैसे उस दोपहर उनके पास एक के बाद एक पच्चीस फोन आ गए. अख़बारों से, प्रमुख मीडिया नेटवर्कों से और कई संसाधन संपन्न रिपोर्टरों के ये फोन थे. ये सभी माने बैठे थे कि मैं चूंकि मिडल ईस्ट (पश्चिम एशिया) से आता हूं और वहां के बारे में लिखता भी रहा हूं लिहाज़ा इस वारदात पर औरों से कुछ न कुछ ज़्यादा ज़रूर जानता हूंगा. सईद के मुताबिक अरबों, मुसलमानों और आतंकवाद के बीच नितांत काल्पनिक संबंध गढ़ लेने की ऐसी मिसाल इतनी बलपूर्वक मुझ तक कभी नहीं पहुंची थी, मुझे ग्लानि के बोध से इस तरह भर दिया गया कि जैसे यही भावना मुझमें रहनी चाहिए थी. मीडिया ने मेरा अपमान किया था. और इसकी वजह था- इस्लाम या उससे मेरा संबंध.

सईद के मुताबिक ‘इस्लाम’ को लेकर पश्चिम में स्टीरियोटाइप विचार हैं. उन्हें लगता है जैसे यही एक शब्द समूची सभ्यता वृहद समाजों करोड़ो अरबों लोगों उनकी संस्कृतियों और अस्मिताओं का अकेला पता है. इसी आधार पर पूर्वाग्रही विचार बने हैं. ये किताब इसी विचार की ठोस ढंग से पड़ताल करती है. वो इस्लामी कहे जाने वाले मुल्कों के समाजों के व्यहवारों की निष्पक्ष छानबीन भी करती है और बताती है कि किसी भी समाज की रिपोर्टिंग के लिए एक निरपेक्ष मुस्तैद निगाह ही नहीं मानवीय और प्रबुद्ध सरोकार भी चाहिए होते हैं. यह एक सुखद संयोग है कि असद ज़ैदी की कविताएं एक महत्त्वपूर्ण चिंतक के अंतरराष्ट्रीय आकलन को ही जैसे समांतर और लोकल स्तर पर आगे बढ़ाती हुई हमें आगाह करने की कोशिश और हमसे समझदारी दिखाने की अपेक्षा करती हैं.  
 
देखों तो क्या पक रहा है निकट भविष्य के रसोईघर में
धुआं और ख़ुशबू ही बता देने के लिए काफ़ी है कि
यह बद से बदतर होता जा रहा एक मुसलसल
राष्ट्रीय दुखांत है कोई तीन घंटे लंबी फ़िल्म नहीं.

असद ज़ैदी भविष्य के जिस आसन्न ख़तरे की बात कर रहे हैं उसका एक ठोस इशारा प्रख्यात समाजशास्त्री रजनी कोठारी ने अपने एक निबंध- जनतंत्र और नागरिक समाज में दिया है. वो कहते हैं कि 6 दिसंबर आत्मसंतुष्टि के युग के अंत का प्रतीक था. आधुनिक विज्ञान व तकनीकी, संप्रभु राज्य, वर्ग चेतना पर आधारित ऐतिहासिक द्वंदवाद और आर्थिक विकास के मॉडल में आस्था पर आधारित आत्मसंतुष्टि की यह भावना 6 दिसंबर के साथ ही काफूर हो गयी. यह अनिश्चित भविष्य की ओर संक्रमण की शुरूआत थी. यह लक्ष्य व नीति और संस्थानिक स्वरूप के मामले में बुनियादी सोच में एक तरह के शून्य का द्योतक था. इस शून्य ने कई नई प्रवृत्तियों व कल्पनाओं को जन्म दिया है- भूमंडलीकरण, हिंदुत्व, विश्व मानचित्र का नृवंशीय रेखांकन, एक नए किस्म की अमेरिकी दादागिरी. (पुस्तक-सांप्रदायिकता और भारतीय राजनीति) 

 

3.

‘कवरिंग इस्लाम’ पुस्तक के के आख़िरी अध्यायों ‘नॉलेज एंड पावर’ में एडवर्ड सईद लिखते हैं: 

कुल मिलाकर, इस्लाम और गैर पश्चिमी समाजों का मौजूदा कवरेज कुछ ख़ास वादों, पाठों और सत्ताओं को प्रतिष्ठित कर देता है. इस्लाम के मध्ययुगीन और ख़तरनाक और हमारे लिए क्रूर और डरावना होने के विचार ने बहुत अच्छी तरह परिभाषित संस्कृति और राजनीति व्यवस्था में अपनी जगह बना ली है. इस पर अधिकारियों का सीधे सीधे हवाला दिया जा सकता है, संदर्भ गढ़े जा सकते हैं, इस्लाम से ख़ास किस्म की मिसालें इसके ज़रिए निकाली जा सकती हैं- ये कोई भी कर सकता है, सिर्फ विशेषज्ञ या पत्रकार नहीं.

एडवर्ड सईद का कहना है कि उपरोक्त बातें इस्लाम का ओर्थोडॉक्स कवरेज निर्मित करती हैं. सत्ता के साथ जुड़ाव की वजह से जिसे ताक़त और स्थिरता मिलती है और सबसे अहम, उपस्थिति हासिल होती है. लेकिन सईद के मुताबिक इस्लाम पर एक और तरह का नज़रिया इधर प्रचलन में है जो एंटीथेटिकल नॉलेज(प्रतिवादी ज्ञान) की कैटगरी में आता है.  

एंटीथेटिकल नॉलेज से मेरा अभिप्राय उस ज्ञान से है जिसे वो लोग पैदा करते हैं जो प्रचलित ओर्थोडॉक्सी के ख़िलाफ़ जागरूक ढंग से लिख रहे होते हैं. विभिन्न कारणों से और विभिन्न परिस्थितियों में वे ऐसा करते हैं. इस प्रतिवादी ज्ञान की तीन प्रमुख धाराएं हैं. पहले तो वे युवा स्कॉलर हैं जो नाज़ुक मिज़ाज हैं और राजनैतिक रूप से ज़्यादा ईमानदार हैं. वे इस्लाम पर किए जा रहे काम को कहीं न कहीं राज्य की राजनैतिक गतिविधियों से जोड़ते हैं और इसीलिए ये ज़ाहिर भी नहीं करते कि वे ओबजेक्टिव स्कॉलर हैं. उनके लिए अमेरिका का विश्व राजनीति में दखल का तथ्य-जिसका बहुत सारा संबंध मुस्लिम जगत से भी है- ऐसी चीज़ है जिस पर ख़ामोश नहीं रहा जा सकता या जिसे निरपेक्ष सच के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है. इस धारा के प्रतिनिधि अपनी फील्ड के  विशेषज्ञों की हैसियत से मामले को समझने की कोशिश करते हैं और इसके तहत वो मार्क्सवादी मापदंड पर भी आकलन पेश करते हैं जिसमें वे कभी कभार क़ामयाब भी रहते हैं.

दूसरा ग्रुप यानी दूसरी धारा बुज़ुर्ग विद्वानों की है. जिनका अपना काम कई सारी वजहों से पुरातनपंथी स्कॉलरशिप के समांतर खड़ा है. जैसे इस धारा के कई विशेषज्ञों ने ईरानी क्रांति से पहले उलेमा की राजनैतिक भूमिका को गंभीरता से लिया था.... जबकि मिडल ईस्ट के अध्ययन प्रतिष्ठान से इनमें से किसी का लेना देना नहीं है. तीसरी और आख़िरी धारा उन लेखकों, एक्टिविस्टों और बौद्धिकों की है जो इस्लाम के अधिकृत(मान्यता प्राप्त) जानकार नहीं है लेकिन समाज में उनकी विरोधी भूमिका ने उनका स्टैंड साफ कर दिया है. ये युद्ध विरोधी साम्राज़्यवाद विरोधी चरपमंथी हैं, आक्रोशित धर्मगुरू, उग्रवादी बौद्धिक और शिक्षक और इसी तरह के लोग.....ये लोग भले ही विशेषज्ञ न हो लेकिन लगता है कि उन्हें उत्तर उपनिवेशी दुनिया के कुछ खास डायनेमिक्स की समझ है. उनकी बहस का फोकस मनुष्य का अनुभव है न कि इस्लामी मस्तिष्क या इस्लामी व्यक्तित्व.

एडवर्ड सईद उपरोक्त इस्लामी विशेषज्ञताओं की व्याख्या करते हुए याद दिलाते हैं कि अंतत:  इस विचार के दूसरी तहज़ीबों पर पड़ रहे असर के मद्देनज़र जो संघर्ष इसका राजनैतिक सवालों के रूप में प्रभुत्वशाली पश्चिम समाजों के संस्थागत ज्ञान से होता है वो एक ऐतिहासिक क्षण है. ये उस सवाल को भी लांघ जाता है कि कोई इस्लाम समर्थक है या इस्लाम विरोधी. या कोई शख़्स देशभक्त है या देशद्रोही. हम एक लोकतांत्रिक संप्रभु देश के नागरिक हैं. हम यों ही देश के नाम की दुंदुभि नहीं बजाते फिरते हैं. राष्ट्र का तिलक लगाकर घूमने का पाखंड नहीं करते हैं. हम उसे वास्तव में प्यार करते हैं और अपने लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हैं और इसी प्यार के जज़्बे के कारण हममें पूरी दुनिया को प्यार करने की तमीज़ और हिम्मत आती है. ऐसा तमाम रचनाकर्म- कविता हो या ख़बर या निबंध या नाटक या पेंटिंग जो नव सांप्रदायिक नव साम्राज्यवादी दैत्य के सामने खड़ा है, उसे अकेला तो हरगिज़ नही छोड़ा जा सकता. हम किसी और की गलती की सज़ा भुगत रहे लोगों को मुल्कों को भी अकेला नहीं छोड़ सकते. जैसे इराक़ जहां अमेरिका का उत्पात मचा है या अफ़गानिस्तान जहां मित्र सेनाओं और लादेनवादियों और तालिबानियों का उत्पात मचा है. ग़ज़ा को कैसे छोड़ा जा सकता है जहां इस्राएली सेना की बर्बरताओं को दुनिया देख ही रही है. तो पक्ष में तो खड़ा होना ही होगा. कौन सा पक्ष हम लेते हैं ये हमारा निर्णय हमारा विवेक है. एडवर्ड सईद आगाह कराते हैं कि जैसे जैसे हमारी दुनिया और नज़दीक गुंथती जा रही है, पहले से कम हो रहे संसाधनों, सामरिक इलाक़ों, और विशाल आबादियों पर नियंत्रण की इच्छा और बलवती होगी और ये और ज़रूरी लगता जाएगा. अराजकता और अव्यवस्था के सावधानी पूर्वक बनाए ख़ौफ़ की बदौलत, बहुत संभव है कि विचारों की खेप तैयार होगी जो- बाहरी दुनिया के संदर्भ में- ज़्यादा अविश्वास फैलाएगी. ये बात इस्लाम के बारे में उतनी ही सच है जितना कि पश्चिम के बारे में. सईद  आख़िरकार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि उपलब्ध सारे ज्ञान का उद्देश्य मानवीय और राजनैतिक संदर्भो में ये होना चाहिए कि वो सह जीवन और समुदाय के काम आए, न कि चुनिंदा नस्लों, राष्ट्रों, वर्गों, या धर्मों की सेवा के लिए. अगर ऐसा नहीं होता तो भविष्य के लिए ये एक बुरा लक्षण हैं.    

सईद की बात की तस्दीक होते भी देर नहीं लगती. कितनी मिसालें हैं. इधर जिस तरह से आदिवासी इलाक़ों की आमूलचूल सफ़ाई का अभियान भारत में चला है जिसका एक हिस्सा ऑपरेशन ग्रीन हंट है, वो भी तो नियंत्रण की इच्छा का ही एक उदाहरण है. उन इलाकों में विकास क्यों नहीं पहुंचा और क्यों जंगल खाली कराए जा रहे हैं, इसबात का जवाब कंपनियां और सरकारें नहीं देती. कितना विचित्र है कि छत्तीसगढ़ के एक बड़े इलाके को जनगणना की इस महा एक्सरसाइज़ से इसलिए दूर रहना पड़ेगा क्योंकि ज़िला प्रशासन ने इसके लिए विनती की है कि उन अंधेरों में नक्सलियों के रहते जाना दूभर है.
इराक़ की एक युवा पत्रकार का इंटरव्यु पढ़ा था पिछले दिनों बीबीसी की अंग्रेज़ी वेबसाइट पर. उसका नाम सहर है और वो इराक़ में ख़तरनाक कठिन हालात में रिपोर्टिंग करने जाती है. इंटरनेशनल वीमेंस मीडिया फाउंडेशन की तरफ से उसे अन्य इराक़ी महिला पत्रकारों के साथ 2007 का करेज इन जर्नलिज़्म अवार्ड मिला है. उसका कहना है कि वो पत्रकारिता में इसलिए आयी कि ये कोई नहीं बता रहा था कि देश को कितना बड़ा नुकसान हो रहा है. वे लोग जो नहीं जानते कि हमारे पास क्या था, वे हालात को ठीक से नहीं समझ सकते और क्योंकि वे नहीं जानते कि हमारे पास क्या कुछ था लिहाज़ा वे शायद ये भी नहीं जान सकते कि हमने क्या खो दिया है. ये पूछे जाने पर कि आख़िर वो क्यों कर खुद को इतने बड़े जानलेवा ख़तरे में धकेल रही हैं, वो क्योंकर पत्रकारिता कर रही हैं तो इस पर सहर का कहना है कि इस सवाल का उसके पास एक पुख़्ता जवाब है. एक औचित्य है. एक तर्क है. सहर के मुताबिक जो ख़बरें आती हैं वे महज़ आंकड़ों की हैं लोगो की नहीं. अगर लोगों की कहानियां बाहर नहीं आएंगी, अगर लोग ये महसूस नहीं करेंगे कि किसी अली, मोहम्मद या सलीम की मौत किसी जॉन या एंड्रयु या किसी और की जैसी ही मौते है, अगर ये कहानी सामने नहीं आती और उपस्थिति दर्ज़ नहीं कराती तो कोई भी मेरे मुल्क में जारी इस हत्याकांड को रोकने की कोशिश में आवाज़ नहीं उठाएगा. क्या हम ख़बर को उस तरह देख पाते हैं जैसे वो लड़की देख रही है जो गोली धुंए बमों और बारूदी सुरंगों के बीच रिपोर्टिंग करने जाती है और किसी को नहीं पता कि वो कौन है. क्योंकि उसे अपनी पहचान छिपाकर काम करना पड़ता है वरना उसे मार दिया जा सकता है. फ़लिस्तीन के गज़ा में काम कर चुके बीबीसी के एलन जॉन्सटन बड़े पत्रकार हैं लेकिन सहर नाम से संबोधित ये लड़की हमारे वक़्त की शायद बहुत बड़ी पत्रकार हैं.

4.

महान उपन्यासकार ग्राबिएल गार्सिया मार्खेज़ ने कहा था कि उन्हें अपने कथानक के औजार और तमाम उपकरण पत्रकारिता से मिलते हैं. पत्रकारिता एक कथ्य के जादू को प्रकट करने का अन्यतम औजार है. फिर ये जादू कितना ही सघन दुर्लभ सजीव मार्मिक और दर्दभरा क्यों न हो. इतना और जोड़ देना चाहिए कि पत्रकारिता जिस घटना को रिपोर्ट करने पहुंचती है कविता एक पूर्वाभास की तरह उसे पहले प्रकट कर देती है. अपने वरिष्ठ कवि रघुबीर सहाय की ठीक एक कविता की तरह (ख़तरा होगा ख़तरे की घंटी होगी और उसे बादशाह बजाएगा- रमेश) बहुत पहले असद ज़ैदी की भी एक कविता हालात से आगाह करा चुकी थी.

यह जो शहर यहां है
इसका क़िला गिर सकता है

कारें रुक सकती है किसी वक़्त

फिसल सकते हैं महाराजा
यहां कनाट प्लेस में

एक धुआं उठ सकता है
और संभव है जब तक धुंआ हवा में घुले,
हमारी संसद वहां न हो

धुंधला पड़ सकता है यमुना का बहाव
सड़कें भागती और अदृश्य होती हो सकती हैं
लट्टू बुझ सकते हैं
दर्द के बढ़ते-बढ़ते फट सकता है सिर
ज़मीन कहीं से भी जा सकती है यहां से सरककर

ये अहम कविता उन कविताओं में से एक है जो बक़ौल असद 1980 से पहले के समय, सत्तर के दशक के उत्तर भारतीय समाज और राजनीति के साये में लिखीं गयी थीं. बहुत से हादसे तब तक नहीं हुए थे और आज जो दौर ताबूत में पड़ा सा नज़र आता है, उस वक़्त ज़िन्दा औऱ चलता-फिरता था।  आप देख सकते हैं और विवेकपूर्ण अंदाज़े लगाने के लिए स्वतंत्र हैं कि इस कविता ने आने वाले समय की कितनी भीषणताएं दिखा दी थीं. आतताइयों ने समाज में किस तरह अपना एजेंडा घुसा दिया है उस नज़रिए से भी ये कविता पढ़ सकते हैं और इसी में अमेरिका प्रायोजित बाज़ार की चर्चा में आगे हम पाते हैं कि उसके विस्तार की महायोजना का सीधा संबंध सांप्रदायिक उभार और समाज विभाजन में है. कि ये अब निर्विवाद तथ्य है.

उन समाचारों को फिर से लिखो
जो अफ़वाहों औऱ भ्रामक बातों से भरे थे
कि कुछ भी अनायास और अचानक नहीं था
दुर्घटना दरअसल योजना थी

 

अयोध्या की बाबरी मस्जिद का ध्वंस इसी दुर्घटना कही गयी योजना का हिस्सा था. ठीक जैसे अमेरिका और उसकी मित्र सेनाएं अफ़गानिस्तान और इराक़ में लादेन की तलाश में नागरिक स्थानों पर बम गिराकर बाद में उसे चिल्ला चिल्ला कर दुर्घटना कहने लगती हैं. अमेरिका अगर महा विनाश के हथियारों और सद्दाम की लादेन से दोस्ती ख़त्म के नाम पर इराक पर हमला बोल कर उसे मिटा दे या अफ़गानिस्तान में किसी ज़माने में अपने पैदा किए तालिबानियों को उखाड़ने के लिए एक अंतहीन युद्ध छेड़ दे तो कौन इन हरकतों को जायज़ ठहराएगा. और आप ये सोचिए कि अफ़ग़ानिस्तान को मलबा बनाए कई साल हो गए. कथित तौर पर पुनर्निर्माण भी चल पड़ा जिन्हें मित्र देशों की सेनाएं ही कर रही हैं. तालिबानी अब भी नही मरे. वे तो और सक्रिय हो गए. पाकिस्तान अफ़गानिस्तान सीमा और पाकिस्तान की स्वात घाटी पर तो उनका एक तरह से क़ब्ज़ा ही हो गया. वे पाकिस्तान में आम लोगों को जब चाहे बमों से उड़ा रहे हैं. क्यों. कैसे. क्या अमेरिका के उपग्रह लादेन और तालिबानियों को ढूंढने में विफल हैं. क्या जान बूझकर इस हिंसा को फैलाए रखा जा रहा है. क्या एक देश की संप्रभुता को फौजी बूट कुचलते रहेंगे. क्या यही तय हुआ है संयुक्त राष्ट्र में. किसका है वो आतंक और क्या है वो आतंकवाद जिसके सफाए का शोर गूंज रहा है. भारत कैसे इसकी चपेट में आ गया. ये ‘वार अंगेस्ट टैरेरिज़्म’ क्या बला है. पाकिस्तान में ख़ूनी उत्पात मचाते तालिबानियों और लादेनवादियों ने अपनी हिंसा का रूख़ भारत की तरफ़ कर दिया. किसने ऐसा हो जाने दिया. अब एक तरफ़ ‘वार’ हैं दूसरी तरफ़  अमेरिका पोषित बाज़ार का वार है. भारत में तेल के अजस्र भंडार नहीं है वरना यकीन मानिए किसी न किसी बहाने अमेरिका से चला युद्ध यहां कब का आ पहुंचता. लेकिन चिंता की बात ये है कि तेल नहीं है लेकिन भारत में एक विशाल उपभोक्ता आबादी तो है. उसे निशाने पर रखते हुए अमेरिका ने महा बाज़ार खड़ा कर दिया है. बहुराष्ट्रीय कंपनियों का इतना बड़ा अड्डा दुनिया में और कहीं नहीं है. और उपभोक्ताओं की विशाल भीड़ के समांतर इसी देश में खनिजों और दूसरे प्राकृतिक संसाधनों से भरे जंगल और उनकी छांव में रहने वाला विशाल आदिवासी समाज भी है. इस समाज को उखाड़ने की कोशिशें हाल के वर्षों में सघन हुई हैं. और कहा ये जा रहा है कि यहां चूंकि नक्सलवाद घुसा है लिहाज़ा ये सबसे बड़ी बीमारी है.     

अब शायद ज़्यादा बहादुरी से लिखने लगें
हमारे समकालीन कवि समकालीन कविताएं

खत्म हुए सावधानी और आशंका के छह साल
अब नहीं कहना पड़ेगा उन्हें आए दिन : आख़िर
हम भी तो ब्राह्मण हैं! और सेक्युलर हैं तो क्या
हिन्दू नहीं रहे ?

असद ज़ैदी की कविता सेक्युलरिज़्म के पक्ष में या हिंदुवादियों पर असंख्य कटाक्षों वाली कविता ही नहीं है. जैसे कि वो किसी बदले पर उतारू हो. और खुंदक से भरी हो. वो सरलीकृत होकर सवाल नहीं मांगती. वो एक विराट पतन की सूचना देने वाली कविता है. उसमें मनुष्यता का ह्रास होते जाने का मार्मिक उदास अवसाद भरा ब्यौरा है. वो मनुष्य की आत्मा के सूखे को इंगित कर वहां से खो गयी किसी चीज़ की तलाश की कविता है. वो आत्मा के द्रव की तलाश है. उस सामान की तलाश जो मनुष्यता की गठरी में हमेशा महफ़ूज़ रहता था. कट्टरपंथियों को इस कविता से कष्ट हो रहा है कि उन्हें लगता है अरे ये तो कोई उन्हें आईना दिखा रहा है. और इसमें वे कैसे साफ़ साफ़ लकीर दर लकीर दिख रहे हैं. उनका विरोध अपनी भयावहता को देखकर भी उसे ख़ारिज कर देने के हठ का विरोध है. नहीं ये हम नहीं है. फिर आप कौन हैं. असद ज़ैदी की कविता दिलेरी धैर्य और साफगोई से ये सब बताती चलती है. उसका काम एक सजग इंटरप्रिटेशन का है. बक़ौल एडवर्ड सईद इंटरप्रिटेशन को अपनी विधियों और अपने लक्ष्यों में सेल्फ कौंसियस होना चाहिए. तभी वो जागरूक और मानवीय रह सकेगी. और तभी वो किसी ज्ञान का आधार बन सकेगी. सईद का ये कथन इस्लाम पर मीडिया के नज़रिए को लेकर है. लेकिन इसी कथ्य को असद की कविता के सहारे आज़माएं तो महज़ लिखा जाकर क़ाग़ज़ में रूख्सत हो जाना और यूं ही फ़नां हो जाना शब्द का कर्म और उसकी गति नहीं है. वो एक सजग पॉलिटिक्ल कविता है. असद ज़ैदी की ‘संस्कार’ कविता एक सजग और मानवीय इंटरप्रिटेशन की मिसाल है. बैचेनी और उधेड़बुन में घिरे एक आम इंसान एक आम नागरिक के सवालों से डबडबायी कविता है यह.

बीच के किसी स्टेशन पर
दोने में पूरी-साग खाते हुए
आप छिपाते हैं अपना रोना
जो अचानक शुरू होने लगता है
पेट में मरोड़ की तरह
और फिर छिपाकर फेंक देते हैं कहीं कोने में
अपना दोना
सोचते हैं : मुझे एक स्त्री ने जन्म दिया था
मैं यों ही दरवाज़े से निकलकर नहीं चला आया था.  

 

अगस्त सितंबर 2008 की घटनाओं के बाद यकायक उत्तरप्रदेश के शहर आज़मगढ़ को इंटरप्रेट करने का सिलसिला चल पड़ा था. ध्यान रहे कि समूचे इराक़ को अमेरिका और उसके दोस्तों ने ऐसे ही इंटरप्रेट किया था. ईरान निशाने पर है ही. ख़बरें हैं कि उत्तर कोरिया का नाम आतंकवादी देशों की लिस्ट से हाल में अमेरिका ने हटा दिया है. अपने देश में मुसलमान से ‘डील’ करते हुए, एक आम कमज़ोर ग़रीब आदमी से ‘डील’ करते हुए ताक़तवर और बहुसंख्यक वर्ग के मन में एक अमेरिका जड़ जमाए बैठा है. फन फैलाए बैठा है कहना भी ग़लत न होगा. यह एक बहुत ही ग़ैर वाज़िब गैर ज़िम्मेदाराना और अति सरलीकृत इंटरप्रिटेशन है कि उड़ीसा में ईसाईयों पर हुए हमले, ननों से बलात्कार, कत्लोग़ारत और आग के ख़ौफ़नाक मंज़र की वजह आरक्षण है. दलितों और आदिवासियों के टकरावों के पीछे आरक्षण से पैदा असंतोष और उसका फ़ायदा उठाने की अधीर मारक होड़ है. ये कहकर उस फ्रैंकंश्टाइन नाम के महा दैत्य की छाया से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता जो यूं गल्पविज्ञान से आता था लेकिन अब सांप्रदायिक हो चुके दिल दिमागों में फूट रहा है.

 

5.

एक दिन इस दुनिया से उर्दू बोलने वालों का
सफ़ाया हो जाएगा
रह जाएगी बस हमारी प्यारी हिंदी भाषा
दफ़ना देंगे फिर हम अपनी यह कुल्हाड़ी

न जाने ऐसे कितने युवक और उनके परिवार और बच्चे यातना भुगत रहे होंगे. अपनी बदहाल ज़िंदगियों में किसी तरह सिर उठाकर जीते इन लोगों को नहीं पता कि कब कौन आकर घर के मुखिया को उठा ले जाएगा. गुजरात के सोहराबुद्दीन का ‘एनकाउंटर’ लोगों के ज़ेहन में गड़ा हुआ है. दिल्ली के जामियानगर की कथित मुठभेड़ ने सबको अवाक और स्तब्ध कर दिया है. माओवाद से सांठगांठ रखने के आरोप में एक्टिविस्ट प्रोफेश्नल्स जेल में बंद हैं. लोकतंत्र की चमकीली छांव में ये कैसा कर्मकांड चल रहा है. पूरा देश शक्की निगाहों का बंधक बना हुआ है जैसे. और रह रह कर कभी अहमदाबाद कभी सूरत कभी हैदराबाद कभी बनारस कभी बंगलुरू जयपुर कभी दिल्ली कभी कंधमाल हुआ जाता है. लोग मारे जा रहे हैं दबोचे जा रहे हैं और जलाए जा रहे हैं(अगस्त सितंबर 2008 का उड़ीसा कंधमाल कर्नाटक). ये कौन सा क्रूर महायज्ञ इस महादेश में चल रहा है. जिसमें लाशों और हड्डियों और ख़ून की आहुतियां दी जा रही हैं. और जिसके बारे में हम सबने महाकाव्यों में ही पढ़ा था. कैफ़ी आज़मी के अयोध्या के राम का दूसरा वनवास लंबा ही खिंचता जा रहा है.

ऐसे भीषण वक्तों में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की याद आना लाज़िमी है. नेहरू की राजनीति को लेकर बहस मुबाहिसे बहुत हैं लेकिन इस बात पर किसी को शक नहीं होना चाहिए कि वो शायद स्वाधीनता पश्चात भारतीय राजनीति के पहले दिलेर दूरदर्शी और सेक्युलर( शायद अकेले भी क्योंकि उनके जैसा साहस फिर नहीं दिखा) राजनेता थे जिन्होंने अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुस्लिम समुदाय के प्रति ज़िद की हद तक प्रतिबद्धता और ईमानदारी दिखायी. देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल जब ये कह रहे थे कि विभाजन के बाद भारत में रह गए मुस्लिमों को भारतीय संघ के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखाना ही काफ़ी नहीं है उन्हें ये साबित भी करना होगा, उसी दौरान विभाजन के तीन महीनों बाद ही नेहरू ने विभिन्न प्रांतों के मुख्यमंत्रियों को भेजी चिट्ठियों में अपनी अक्षुण्ण सेक्युलर भावना का इज़हार किया. ये एक तरह से देश के मुखिया की बनते हुए देश के अन्य दिग्गजों को साफ़ ताक़ीद भी थी(देश के तत्कालीन शीर्षस्थ नेतृत्व में वैचारिक विरोधाभास और सैद्धांतिक टकराहटों का ये दुर्भाग्यपूर्ण वक़्त भी था.) 1948 में पटेल के गृह मंत्रालय के सचिव ने अन्य विभागों के सचिवों को चिट्ठी लिखी कि वे अपने विभागों में कार्यरत मुस्लिम कर्मचारियों की निष्ठा की परख कर लें. उन्हें कोई ख़ुफ़िया काम न सौंपा जाए. जिन पर देश की सुरक्षा को ख़तरे में डालने का शक है उनकी लिस्ट भी बनाई जाए. और इस आधार पर उन्हें गोपनीय कार्यो और प्रमुख पदों से दूर रखा जाए. इसी में आगे ये चिट्ठी लिखने वाले सचिव महोदय ने कहा: I need scarcely add that I am sure you will see that there is no witch hunting; and that only genuine cases are included in the lists.  इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब इंडिया आफ्टर गांधी में ये विवरण दर्ज है. लिस्ट की ये एक्सरसाइज़ कई रोंगटे खड़े करने वाली दास्तानों तक जाती हैं जिसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है. नेहरू अपने गृहमंत्री के मंत्रालय के इस अभियान से कितने वाक़िफ़ थे और क्या उन्होंने इसके लिए हां की थी, इस पर गुहा का कहना है कि ये बात कभी स्पष्ट नहीं हो पायी. बहरहाल नेहरू ने तत्कालीन हालात पर ये ज़रूर कहा कि, हमारे यहां मुस्लिम माइनोरिटी है जिनकी संख्या इतनी ज़्यादा है कि वे चाहकर भी कहीं और नही जा सकते. ये एक बुनियादी तथ्य है जिसके बारे में कोई बहस नहीं हो सकती. पाकिस्तान भले ही कितना भड़काए, वहां रहने वाले ग़ैर मुस्लिमों पर भले ही कितनी अभद्रताएं और आतंक बरपाए जाएं, हमें यहां इस माइनोरिटी के साथ सभ्य तरीक़े से पेश आना है. हमें उन्हें सुरक्षा देनी होगी और लोकतांत्रिक देश में नागरिकता के अधिकार देने होंगे. अगर हम ऐसा करने में नाकाम रहते हैं, तो सड़ांध मारता घाव बन जाएगा जो नतीज़तन समूची राजनैतिक काया में ज़हर भर देगा और बहुत संभव है उसे नष्ट कर देगा.(रामचंद्र गुहा कि किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ से)

नेहरू ने उस नाज़ुक दौर में जिस हालात का ज़िक्र किया था था वो आज़ादी के साठ साल पार हो जाने के बाद भी अलग और ज़्यादा घातक मिज़ाज के साथ सामने हैं और कोई राजनैतिक शख़्सियत ऐसी नहीं जो नेहरू की जैसी साफगोई और हिम्मत से सांप्रदायिक ताक़तों को ख़बरदार कर सके. इन हालात में असद ज़ैदी की कविता का हौसला ही है कि वो एक सताए व्यक्ति, एक चोट खाए नागरिक की व्यथा का विकल कर देने वाला हलफ़नामा बन जाती है.  

नहीं बराबरी की बात कभी हुई ही नहीं
(हो सकती भी न थी)

उर्दू कोई ज़बान ही न थी

अमीरख़ानी कोई चाल ही न थी

मीर बाक़ी ने बनवायी थी
कोई वह मस्जिद ही न थी

नहीं तुम्हारी आंखों में कभी कोई फ़रेब न था.

न कोई सवाल न कोई तफ़्तीश बस सन सन करते हुए नकार की आवृतियां. और ना की पीड़ा भरी स्वीकारोक्तियों में हां की बैचेनियां. पुलिस कस्टडी में ये बैठा हुआ दिल नहीं छीनने वाले झपटमार बन गए समाज में ये वंचितों की उत्पीड़ितों की बरबस आहें हैं. लेखन के पुरोधाओं को, समाज के पुरोहितो को और राजनीति के झंडाबरदारों को इस आह के हलफ़नामे पर क्या कहना है. उसके बाद बहुसंख्यक कही जाने वाली जनता के बीच से आए बौद्धिकों को और फिर उस जनता के महा वर्ग को जो मस्जिद तोड़ने के हुंकारे में शामिल रही, गुजरात की महा आपदा की ज़िम्मेदार रही और रह रह कर जो दुश्मनी और नफ़रत की मरोड़ से ऐंठने लगती है. इस ऐंठन ने नागरिकता को विकृत कर दिया है.  

लेकिन हताशा की इस डबडबायी तस्वीर के अंदर से जो मर्म झांक रहा है उसे देखना चाहिए. आहिस्ता. अब ये आपके हाथ में है और आप क्या देख रहे हैं. ये आपकी आंख और आपके दिल के अंधेरो को चीरती हुई झिलमिल किस चीज़ की है. आपका वजूद सहसा आपकी हथेलियों में कैसे आ गया. और वो कैसे वहां पर हिल रहा है कि उसे सांस की हरकत भी गवारा नहीं. उस पर ये रोशनी कहां से गिर रही है. आपकी औकात पर ये किसकी बिजली चमकी. कौन सा तारा टूट पड़ा और उसकी किरचियां फैली हुई हैं. या यह आपके सामने आपका वो उन्मादी अधर्मी वजूद है कि धीरे धीरे गर्क की जा रही मनुष्यता का मलबा.

 

6.

इस मलबे के पीछे कुछ दूर जाकर
नदी के उस तरफ़ कई क़ब्रें हैं
जिनमें दबी हैं कुछ कहानियां
जंग लगा एक चिमटा
तांबे का प्याला
एक तहमद एक लाठी एक दरी
मेंहदी से रंगे बाल
2 गुणा तीन इंच का नीले शीशे का
चमकदार टुकड़ा
और इसी तरह कुछ अटरम-सटरम

हर शै ख़ामोश
लेकिन अपनी जगह से कुछ सरकी हुई

हर शै, दम साधे,
हमारी तरह,
किसी इन्तज़ार में.
नदी के उस तरफ़ की क़ब्रों तक कितने धुरंधर पत्रकार और लेखक गए हैं. उनमें दबी कितनी कहानियां निकाली गयी हैं. जैसा कि रजनी कोठारी ने कहा है कि आज के दौर की सांप्रदायिकता राजव्यवस्था के जनतांत्रिक आधार के पुनर्निर्माण और बिखराव के शिकार भारतीय नागरिक समाज की सांस्कृतिक जड़ों के पुनर्जीवन के लिए बहुत बड़ी चुनौती है.
ग्लानि और अपराध के इस दौर में जब
हर ग़लती अपनी ही की हुई लगती है
सुनायी दे जाते हैं ग़दर के नगाड़े और
एक ठेठ हिन्दुस्तानी शोरगुल
भयभीत दलालों और मुख़बिरों की फुसफुसाहटें
पाला बदलने को तैयार ठिकानेदारों की बेचैन चहलक़दमी

1857 की लड़ाइयां जो बहुत दूर की लड़ाइयां थीं
आज बहुत पास की लड़ाइयां हैं.

क़रीब दस साल पहले मुझे उस्ताद असद अली ख़ान की रूद्रवीणा का कैसेट भेंट करते हुए मंगलेश जी ने उस पर लिखा था, जब तुम इसे सुनोगे जाग जाओगे. कमोबेश यही बात असद ज़ैदी की कविता पर उन्होंने विश्व समाज से कही है. असद जी का शुक्रिया कि कविता के उजाले में नागरिक समाज का हाल कुछ हद तक देखा जा सकता है. दुनिया भर की मेहनतकश और सजग पत्रकार कवि लेखक कलाकार बिरादरी का भी शुक्रिया, ब्लॉग और इंटरनेट की उस जमात का भी गहरा शुक्रिया जो अन्याय अज्ञान और वहशियत के ख़िलाफ़ हिम्मत और ज्ञान का एक समांतर संसार निर्मित किए हुए है. ख़ुशी और सुकून की बात है कि ये फैलता ही जाता है. एडवर्ड सईद ने लिखा हैं कि- एक स्कॉलर या एक इंटेलेक्चुअल व्यक्ति की चुनौती ये है कि वो अपना इंटेलेक्ट( अपना सहज विज़डम) किसे अर्पित करता है ताक़त और सत्ता को या आलोचना, समुदाय, संवाद और नैतिक बोध को. 
 

-शिवप्रसाद जोशी.

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हिलवाणी एक बहुत ज्ञानवर्धक वेबसाइट है। यहाँ हमें उत्तराखंड से जुडी हुयी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। आपका प्रयास स्तुत्य है। बस एक सुझाव देना चाहता हूँ कि यहाँ आप कुछ आलेख गढ़वाली भाषा में भी डालें क्योंकि हमारी भाषा हमारी पहचान है। पहाड़ों कि संस्कृति बचानी है तो सबसे पहले हमारी भाषा को बचाना होगा। गुणानंद पथिक जी कि गढ़वाली कविता पढ़कर अच्छा लगा।
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बहुत ही अच्‍छा प्रयास है सार्थक बनाये रखे.
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